फीस भरने में देरी हुई तो बच्चे ही क्यूं झेले शर्मिंदगी?

फीस भरने में देरी हुई तो बच्चे ही क्यूं झेले शर्मिंदगी?
crying kid

Amanpreet Kaur | Publish: Aug, 25 2016 01:39:00 PM (IST) स्कूल लाईफ

अक्सर स्कूल प्रशासन फीस भरने में देरी होने पर पेरेंट्स से संपर्क करने की बजाए बच्चों को ही हिदायतें देने लगते हैं

केस 1 : 11 साल की वर्षा को कुछ दिनों पहले स्कूल की फीस भरने में देरी होने के कारण क्लास में खड़ा कर दिया गया। छुट्टी होने पर वह घर रोते हुए गई। कुछ दिनों तक वह इसी मानसिक स्थिति में रही। न घर पर ठीक से बात की और न ही दोस्तों से।  

केस 2 : कई स्कूलों में फीस समय पर न भरे जाने पर बच्चे को स्लिप देने या डायरी में नोट डालने का प्रावधान है। कुछ माह पहले 10 साल की रूबी को क्लास में स्लिप दी गई। हिदायत दी कि दो दिन में फीस जमा हो जानी चाहिए। ऐसे व्यवहार से केवल रूबी की पढ़ाई व मानसिक स्थिति पर भी फर्क पड़ा।   

वर्षा व रूबी तो महज उदाहरण हैं। स्कूलों में तय समय सीमा में फीस नहीं भरने की सूचना के नाम पर सजा बच्चों की दी जा रही है। करीब सभी स्कूलों में यही हाल है। स्कूल प्रशासन पैरेंट्स से सीधे संपर्क करने के बजाय सूचित करने के नाम पर बच्चों की डायरी में या तो नोट डालते हैं या फिर परीक्षा में न बैठने देने की धमकी देते हैं। इसका बच्चों के मानसिक स्थिति व पढ़ाई पर असर पड़ सकता है।

यह करते हैं स्कूल संचालक

- 20 से लेकर 50 रुपए प्रतिदिन एक्स्ट्रा फीस
- डायरी में नोट डालना या स्लिप देना
- प्रार्थना सभा या कक्षा में बच्चों को बाहर निकालना
- परीक्षा में न बैठने देना
- पढ़ाई या स्कूल की अन्य गतिविधियों से वंचित रखना
- किसी प्रकार की सजा देना

माता-पिता से करें संपर्क

समाजशास्त्री रश्मि जैन के मुताबिक मध्यवर्गीय व गरीब परिवारों में कभी-कबार स्कूल की फीस देने में देरी हो जाती है। ऐसे में बच्चों को उनके समूह या क्लास के सामने फीस के लिए कहना बिलकुल गलत है। किशोरावस्था में बच्चों की मानसिक स्थिति पर भी इसका असर पड़ सकता है। बच्चे कुंठित महसूस करते हैं। कई बार आपस में एक-दूसरे का मजाक उड़ाते हैं। इस तरह का व्यवहार बच्चों को एक-दूसरे से काट सकता है। इसलिए इंटरनेट व तकनीक के दौर में स्कूल प्रशासन को ईमेल या मोबाइल का इस्तेमाल कर माता-पिता को सीधे संपर्क करना चाहिए।
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