नई रिसर्च में वैज्ञानिकों ने समझाया कि 'परफेक्ट' क्यों नहीं हैं इंसान

बाथ यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने हाल ही एक शोध में बताया कि इंसान विकास के सदियों पुराने कालक्रम के बावजूद आज भी गलतियां क्यों करता है

By: Mohmad Imran

Published: 11 Sep 2020, 06:21 PM IST

अगर विकासक्रम में प्रकृति केवल उन्हीं जीवों को चुनती है जिनमें कोई कमी नहीं होती तो इंसान में अब भी इतनी खामियां क्यों मौैजूद हैं? जबकि जीवों के संसार में वह सबसे योग्य और बुद्धिमान प्राणी है। प्रकृति ने इतनी तरक्की के बावजूद अब तक हमें इतनी सारी कमियों से क्यों बनाया है, इसी सवाल का जवाब ढूंढने का प्रयास कर रहे बाथ यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने हाल ही कुछ रोचक खुलासे किए हैं। विश्वविद्यालय के मिल्नर सेंटर फॉर इवोल्यूशन के वैज्ञानिकों ने पाया है कि ऐसे जीव जिनकी आबादी कम होती है उनमें संयोग की जगह प्रकृति गुणों के आधार पर उनका चयन करती है जिससे उन्हें विकास क्रम में धीरे-धीरे अपनी कमियों को दूर करने का बेहतर अवसर मिलता है।

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एक-बहुकोशिकीय जीवों का अध्ययन
बाथ विश्वविद्यालय के एलेक्स हो और लॉरेंस हस्र्ट द्वारा हाल ही में किए गए इस अनुसंधान में दोनों ने स्तनधारी जीवों की प्रजातियों से लेकर अमीबा जैसे एक कोशिकीय जीवों व शैवाल की एक विस्तृत श्रृंखला के जीनोम का अध्ययन किया है। उन्होंने प्रोटीन बनाने के लिए कोशिकाओं द्वारा उपयोग किए जाने वाले आनुवांशिक प्रक्रिया की भी तुलना की। विशेष रूप से उन निर्देशों की जिन्हें स्टॉप कोडोन कहते हैं जो अंत में कोशिका को कोड पढऩा बंद करने के लिए कहते हैं। प्रोटीन बनाते समय, हमारे डीएनए को स्ट्रिंग में पढ़ा जाता है। एक स्ट्रिंग के अंत में स्टॉप कोडोंस को कोशिका को पढऩा बंद करने के लिए कहता है। अधिकांश जीवों में अपने अंदर मौजूद किसी भी जीन में से तीन एक समान स्टॉप कोडोन (TAA, TGA, TAG) में से एक का उपयोग करने का विकल्प होता है।

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जीन तय करते हैं हमारा 'परफेक्शन'
शोधकर्ता एलेक्स हो और लॉरेंस हस्र्ट ने पाया कि कुछ जीन कम कुशल स्टॉप कोडोन का उपयोग करते हैं, जबकि प्राकृतिक चयन विकास के कारण अधिकांश जीनों को अधिक कुशल कोडोन यानी टीएए का उपयोग करना चाहिए। उन्होंने पाया कि मनुष्यों और अन्य स्तनधारियों में जहां आबादी अपेक्षाकृत छोटी और प्रजनन धीमा है, उनमें सबसे अधिक व्यक्त जीन टीएए का चयन किया गया। हालांकि, चांस इवेंट्स के कारण कम प्रभावी स्टॉप कोडोन बनाने वाले म्यूटेशन चुनाव की इस आवृत्ति में वृद्धि कर सकते हैं। इसे समझाने के लिए दोनों ने पासों का उपयोग किया। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक चयन विकास के कारण आबादी छोटी होने पर पासों का रोल अधिक प्रभावशाली हो जाता है। इसके विपरीत तेजी से अपनी आबादी बढ़ाने वाले जीव जैसे खमीर बनाने वाले बैक्टीरिया में 'चांस इवेंट्स' (Chanse Events) कम महत्वपूर्ण हो जाता है और प्राकृतिक चयन किसी भी कम अनुकूल म्यूटेशन को नहीं अपनाता और ऐसे में टीएए सामान्य हो जाता है। शोध के ये निष्कर्ष आनुवंशिक रोगों के लिए नए जीन थेरेपी के डिजाइन में मदद कर सकते हैं। मिलनर सेंटर फॉर इवोल्यूशन के निदेशक प्रो. लारेंस हस्र्ट का कहना है कि हमारे डीएनए का कुल सेट बैक्टीरिया की तुलना में बहुत अधिक जटिल होता है। मनुष्य के प्रत्येक जीन के बीच बहुत सारे गूढ़ डीएनए होते हैं, जबकि बैक्टीरिया के जीन सिर्फ एक ही प्रकार का डीएनए बनाते हैं।

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इसलिए नहीं होते मनुष्य परफेक्ट
प्रो. लारेंस हस्र्ट का कहना है कि मनुष्यों में प्राकृतिक चयन बहुत कुशल नहीं है और इसलिए हमारा डीएनए एक प्राचीन जंग लगी मोटर कार के समान खत्म हो जाता है। यह बस कार्य करने में सक्षम है जो समय के साथ खराब मरम्मत और अभिवृद्धि के सभी स्वरूपों के साथ ताल-मेल बिठा लेता है। जबकि बैक्टीरिया के डीएनए उसे हर बार शोरूम से बाहर आई किसी नई मशीन की तरह काम करने में सक्षम बनाते हैं। उनका शोध इस ओर भी इशारा करता है कि मानव डीएनए में गलतियां बार-बार दोहराने की खराब गुणवत्ता है जोमनुष्यों जैसे जटिल जीव के लिए एक जटिल मशीन के हिस्से के रूप में काम करता है। प्रोफेसर हस्र्ट ने कहा कि शोध के ये परिणाम इसलिए मायने रखते हैं क्योंकि वे हमें यह समझने में मदद करते हैं कि सिर्फ सामान्य होना ही काफी नहीं न ही यह सबसे अच्छा होने का प्रमाण है। यह आनुवांशिक बीमारियों के लिए और चिकित्सीय दोनों की समझ में मदद करता है। उदाहरण के लिए यह सुझाव देता है कि जीन थेरेपी के लिए नए जीन बनाते समय, हमें बैक्टीरिया की तरह काम करना चाहिए जो सबसे अच्छा स्टॉप कोडोन बनाने के लिए टीएए का ही उपयोग करता है।

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Mohmad Imran Desk/Reporting
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