अंतरिक्ष यान से घर हुआ क्षतिग्रस्त तो कौन देगा मुआवजा?

हाल ही चीन के 20 हजार किलो वजनी अंतरिक्ष यान का एक टुकड़ा अनियंत्रित होकर मालदीव के पास हिंद महासागर में गिरा है।

By: Mohmad Imran

Updated: 31 May 2021, 02:55 PM IST

निजी कंपनियों के आगमन से अब अंतरिक्ष में भी यानों की आवाजाही बढ़ने वाली है। इसी के साथ पृथ्वी की कक्षा से अंतरिक्ष कबाड़ के रूप में उपग्रह, यान और अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन के कचरे का पृथ्वी पर गिरने का सिलसिला भी बढ़ेगा। हाल ही चीन के 20 हजार किलो वजनी एक सैैटेलाइट का भारी-भरकम टुकड़ा अनियंत्रित होकर मालदीव के पास हिंद महासागर में गिरा है। इससे पहले, मई 2020 में भी चीन के एक अन्य रॉकेटभी अनियंत्रित होकर पश्चिमी अफ्रीकी तट पर जाकर गिरा था। लेकिन क्या ऐसे हादसों से होने वाले नुकसान का मुआवजा मिलता है? क्या दुनिया में ऐसे अंतरराष्ट्रीय कानून हैं जो इस तरह की घटनाओं में प्रभावी हों और व्यवहारिक रूप से उपयेाग में हैं? तो जवाब है, हां। विभिन्न देशों की सरकारों ने आपसी सहमति से ऐसे कानूनों को मान्यताा दी है, जो किसी देश के अंतरिक्ष कबाड़ से होने वाले जान-ओ-माल के नुकसान से हमारी रक्षा करते हैं।

अंतरिक्ष यान से घर हुआ क्षतिग्रस्त तो कौन देगा मुआवजा?

क्या हैं 'अंतरिक्षीय कचरा'
अंतरिक्ष में, मानव -निर्मित ऐसी कोई भी वस्तु जो निष्क्रिय होकर पृथ्वी की कक्षा के चारों ओर घूम रही है, वह अंतरिक्ष कचरा या स्पेस डेबरिस कहलाती है। एक शोध के अनुसार, जनवरी 2020 तक, पृथ्वी की कक्षा में मौजूद अंतरिक्ष कबाड़ का वजन करीब 8000 मीट्रिक टन से अधिक है। अक्सर पृथ्वी पर इनके गिरने की घटनाओं के बाद लोगों का एक ही सवाल होता है कि क्या इन्हें गिरने से रोका जा सकता है? अगर इनसे भारी नुकसान हो जाए तो उसकी भरपाई कौन करेगा? विशेषज्ञों का कहना है कि इसके लिए तीन महत्त्वपूर्ण कदम उठाने की जरुरत है। पहला, अधिकृत संस्थाओं को ऐसी खतरनाक परिस्थितियों को पहले से रोकना होगा। दूसरा, नियमों और प्रोटोकॉल्स की पालना और निगरानी के लिए मॉडल तैयार करना होगा। और आखिर में, अगर ऐसे हादसे होते हैं तो अंतरराद्यट्रीय संस्थाओं को जिम्मेदारी तय करने के लिए एक रूपरेखा तैयार करनी होगी।

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अंतरिक्ष यान घर पर गिरे तब क्या
अगर किसी देश का अंतरिक्ष यान आपके घर पर गिरे और दुर्घटनाग्रस्त हो जाए तो ऐसे हादसों के लिए भी अंतरराष्ट्रीय संधी, समझौते और कानून मौजूद हैं। वर्तमान अंतरिक्ष कानून दरअसल, 1967 की 'बाह्य अंतरिक्ष संधी' (Outer Space Treaty) और 1972 की 'दायित्व सम्मेलन' (1972 Liability Convention) के तहत प्रभावी हैं। दोनों समझौतों को अमरीका ने भी अपनाया है। इसके अनुसार, अंतरिक्ष यान का क्षतिग्रस्त या दुर्घटनाग्रस्त होकर किसी अन्य देश की सीमा में गिरने पर, यह दो देशों की सरकारों के बीच का मुद्दा होगा। दोनों संधियों के अनुसार, ऐसे हादसों के लिए वह देश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिम्मेदार होगा और अंतरिक्ष यान से होने वाली किसी भी क्षति के लिए उत्तरदायी होगा। भले ही क्षति उस देश की किसी निजी कंपनी द्वारा ही क्यों न हुई हो।

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कैसे काम करता है क़ानून
इन कानूनों के अनुसार,आपके देश को यह साबित करने की भी आवश्यकता नहीं होगी कि किसी अंतरिक्ष यान के मलबे, क्षतिग्रसत टुकड़े ने पृथ्वी की सतह पर या किसी सामान्य विमान को नुकसान पहुंचाया है। इतना ही नहीं, मान लीजिए कि चीन का अंतरिक्षयान हमारे देश में किसी दूर-दराज गांव में एक घर पर गिरकर नष्ट हो जाता तो इस स्थिति में, भारत सरकार राजनयिक स्तर पर चीन से मुआवजे का दावा करेगी और फिर आपके नुकसान का भुगतान या भरपाई करेगी। अगर भारत ऐसा दावा करने का विकल्प चुनता है तो। हालांकि, इस बात की आशंका बहुत कम होती है कि किसी यान का मलबा आबादी क्षेत्र में गिरे।

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रूस को देने पड़े थे 18 करोड़ रूपये
1978 में, रूस का सोवियत कॉसमॉस 954 उपग्रह, कनाडा के उत्तर पश्चिमी क्षेत्र के एक बंजर इलाके में दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। दुर्घटना के बाद यान के परमाणु रिएक्टर से रेडियोधर्मी मलबा उस क्षेत्र के एक बड़े हिस्से में फैल गया। अमरीका-कनाडा की संयुक्त टीम ने इस रेडियोधर्मी कचरे को हटाया जिसकी लागत उस समय 84 करोड़ रुपए (14 मिलियन कनाडाई डॉलर) से अधिक आई थी। तब कनाडा ने तत्कालीन सोवियत संघ से 36 करोड़ रुपए (6 मिलियन कनाडाई डॉलर) के मुआवजे का दावा किया था। सोवियत संघ ने अंतत: 18 करोड़ रुपए (3 मिलियन कनाडाई डॉलर) देकर मामले को रफा-दफा किया था। यह पहला और अब तक का एकमात्र ऐसा उदाहरण है, जहां लायबिलिटी कन्वेंशन के तहत बने कानून और संधि-समझौते का उपयोग किया गया है, जब एक देश का अंतरिक्ष यान किसी दूसरे देश में दुर्घटनाग्रस्त हो गया हो।

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