भारतीय मूल के वैज्ञानिक ने मन की लेखनी को दी 'शब्दों की जुबां'

क्या खास: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित एक नया डिवाइस बनाने वाले भारतीय मूल के वैज्ञानिक कृष्ण शिनॉय ने लकवाग्रस्त रोगियों और बोलने में अक्षम लोगों के लिए ऐसा उपकरण विकसित किया है जो दिमाग में उमड़ने वाले विचारों के डेटा की व्याख्या कर उनके विचारों को शब्दों और वाक्यों में तब्दील कर सकता है। इस प्रकार वह रोगी अपनी बात आसानी से समझा सकता है।

By: Mohmad Imran

Published: 12 Sep 2021, 06:32 PM IST

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के डॉ. कृष्ण शिनॉय पेशे से एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हैं। हाल ही उनकी टीम ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जो बोलने और लिखने में अक्षम किसी भी व्यक्ति के दिमागी विचारों को शब्दों या वाक्यों के रूप में कम्प्यूटर स्क्रीन पर दिखा सकता है। उन्होंने इसे 'माइंड राइटिंग' का नाम दिया है। अपने प्रयोग में डॉ. शिनॉय ने पक्षाघात से पीडि़त एक रोगी को दिमाग में ही वर्णमाला लिखने की कल्पना करने को कहा। उस रोगी के मस्तिष्क पर लगे कृष्णा के बनाए डिवाइस के सेंसरों ने मस्तिष्क के संकेतों को पढ़कर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ) की मदद से उन संकेतों को डिवाइस से जुड़ी कम्प्यूटर स्क्रीन पर दिखाया। डॉ. शिनॉय और उनकी टीम ने दरअसल, एक ब्रेन-कम्प्यूटर इंटरफेस बनाया है। लकवाग्रस्त व्यक्ति के मस्तिष्क में इसे प्रत्यारोपित किया जा सकता है।

भारतीय मूल के वैज्ञानिक ने मन की लेखनी को दी 'शब्दों की जुबां'

2017 में सफल निष्कर्ष हुए प्रकाशित
इसका सॉफ्टवेयर रोगी के दिमाग में चल रहे विचारों को कम्प्यूटर स्क्रीन पर टेक्स्ट में बदलने और डीकोड करने में सक्षम था। स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने इस प्रयोग के सफल निष्कर्ष सबसे पहले वर्ष 2017 में 'ई-लाइफ' मैगजीन में प्रकाशित किए थे। शोध के नए निष्कर्षों के आधार पर डॉ. शिनॉय और उनकी टीम का दावा है कि यह तकनीक भविष्य में उन सैकड़ों लोगों की आवाज बन सकती है, जिन्होंने रीढ़ की चोटों, स्ट्रोक या लकवाग्रसत होने के कारण अपने बोलने की क्षमता खो दी है। विशेषकर एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस, जिसे लू गेहरिग्स रोग के रूप में भी जाना जाता है, में यह तकनीक बहुत उपयागी साबित हो सकती है।

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ऐसे काम करती है तकनीक
यह तकनीक ऐसे रोगियों की बिल्कुल ठीक उसी तरह मदद करेगा जिस स्पीड से कोई व्यक्ति स्मार्टफोन पर एसएमएस टाइप करता है। अध्ययन में भाग लेने वाले रोगी ने लगभग 18 शब्द प्रति मिनट की गति से दिमागी विचारों को कम्प्यूटर स्क्रीन पर टाइप किया। जबकि इसी उम्र के सक्षम लोग स्मार्टफोन पर प्रति मिनट लगभग 23 शब्द टाइप करते हैं। इस डिवाइस के प्रत्येक चिप में 100 इलेक्ट्रोड हैं जो मोटर कॉर्टेक्स के हिस्से में न्यूरॉन्स फायरिंग से सिग्नल उठाते हैं। मस्तिष्क का यह बाहरी क्षेत्र हमारे हाथ की गति को नियंत्रित करता है। सॉफ्टवेयर तंत्रिका तंत्र के इन संकेतों को सेंसर के माध्यम से एक कम्प्यूटर पर भेजता है, जहां आर्टिफिशियल एल्गोरिदम इन संकेतों को डीकोड करते हैं और रोगी के हाथ और उंगली की गति का अनुमान लगाते हैं। एल्गोरिदम को स्टैनफोर्ड की न्यूरल प्रोस्थेटिक्स ट्रांसलेशनल लैब में डिजाइन किया गया है।

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