ज़ूम कालिंग करते हैं तो आप भी हो सकते हैं इस मानसिक 'बीमारी' के शिकार

लोग घूरते हैं इसलिए वीडियो चैट्स से होता है 'जूम फटीग', स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी ने अपने शोध में पाया कि चार मुख्य बातें इस तरह की 'मानसिक थकान ' के लिए जिम्मेदार हैं

By: Mohmad Imran

Updated: 27 Feb 2021, 05:53 PM IST

कोरोना महामारी (Corona Virus/Pendemic) में वर्क फ्रॉम होम (Work From Home) के दौरान ऑफिस मीटिंग (ZOOM APP) और सामान्य वीडियो कॉलिंग (GOOGLE DUO/ Whattsapp call) एक-दूसरे से जुड़े रहने के सबसे बड़े प्लेटफॉर्म बनकर उभरे हैं। लेकिन बहुत ज्यादा समय तक जूम मीटिंग या वीडियो कॉल से भी मानसिक थकान भी हो रही है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी (Stanford University) के संचार विशेषज्ञ जेरेमी बैलेन्सन ने अपने नए अध्ययन में इसे 'ज़ूम फटीग' (Zoom Fatigue) कहा है। बैलेन्सन का कहना है कि चार प्रमुख कारक हैं जो वीडियोकान्फ्रेंसिंग को विशेष रूप से थका देने वाला संचार (Communication) बनाते हैं। इतना ही नहीं वे इस थकान को कम करने के लिए कुछ सरल समाधान भी सुझाते हैं।

ज़ूम कालिंग करते हैं तो आप भी हो सकते हैं इस मानसिक 'बीमारी' के शिकार

एक सदी पुराना सपना, एक दशक पहले हुआ सच
हालांकि वीडियोकान्फ्रेंसिंग के जरिए बातचीत करने की इस तकनीक का सपना एक सदी से पहले देखा गया था। लेकिन यह एक दशक से लोगों की आम जिंदगी का हिस्सा बन गया है। 'ऐपल फेसटाइम' और 'स्काइपी' के रूप में बीते कुछ सालों से यह सुविधा मौजूद है। महामारी में वीडियोकान्फ्रेंसिंग आम आदमी से लेकर डॉक्टर से लेकर क्लास तक इसी पर आधारित थे। अचानक लाखों-करोड़ों लोग अपना दिन एक स्क्रीन के सामने बैठकर बिताने लगे। जहां एक ही समय पर बहुत से चेहरे हमें घूरते हुए दिखाई पड़ते हैं। जल्द ही 'जूम फटीग' जैसी मानसिक परेशानी सामने आई। लोग वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के बाद एक विशिष्ठ प्रकार की थकावट की शिकायत कर रहे थे। आखिर ऐसा क्यों है कि दिन में कुछ घंटे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग पर लोगों से बात करने की तुलना में हम ऑफिस में 6 से 8 घंटे आमने-सामने की बातचीत में इतनी थकावट महसूस नहीं करते।

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साइकोलॉजिकल इफेक्ट से होती है थकान
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में वर्चुअल ह्यूमन इंटरेक्शन लैब के संस्थापक निदेशक जेरेमी बैलेन्सन दो दशकों से अधिक समय से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग पर शोध कर रहे हैं। उनके अनुसार वर्चुअल कम्यूनिकेशन हमें मानसिक रूप से प्रभावित करता है। जर्नल, टेक्नोलॉजी, माइंड एंड बिहेवियर में प्रकाशित जेरेमी के शोध पत्र में जेरेमी ने वीडियोकॉन्फ्रेंसिंग से होने वाली थकावट के चार मुख्य कारणों की पहचान की है।

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लगातार चेहरे पर नजरें टिकी रहना
उनके अनुसार इस प्रकार के कम्यूनिकेशन में आई-कॉटेक्ट बहुत करीब से होता है। वीडियो चैट स्वाभाविक रूप से अप्राकृतिक हैं। बैलेन्सन कहते हैं कि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान लगातार आंखों के संपर्क और स्क्रीन पर नजर आने वाले कई चेहरों को सामान्य जीवन में हम देखने के आदि नहीं हैं। यानी हम एक समय में एक या दो लोगों से ही सहज होकर बातें करते हैं। लेकिन जूम चैट में, हर कोई स्क्रीन पर लगातार नजऱ रख रहा है। यानी हम हर वक्त लोगों की नजरें हम पर टिकी रहती हैं। यह मानसिक रूप से हमारे लिए सहज नहीं है इसलिए हमें थकान महसूस होती है। यह एक तनावपूर्ण अनुभव है जैसे कोई हमें भाषण देने को कह दे और हम लोगों के घूरने से असहज हो जाते हैं।
उपाय- जूम ऐप पर जब जरुरत न हो तो वीडियो ऑफ कर लें और केवल ऑॅडियो पर बात करें।

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अधिक चेहरों से भी होती है थकान
स्क्रीन पर एक साथ कई चेहरों को देखने से भी थकान और ऊब महसूस होती है, क्योंकि यह हमारे दिमाग को चकरा देता है। हमारा दिमाग इसे समझ नहीं पाता और वह लगातार यह संकेत देता है कि हम किसी गंभीर स्थिति का सामना कर रहे हैं। क्योंकि ऐसी सिचुऐशन (बहस, झगड़ा या लड़ाई) में ही किसी का चेहरा हमारे इतना करीब होता है। जूम ऐप पर इस तरह कि सिचुएशन में घंटों रहने के बाद दिमाग काफी थक जाता है।
समाधान: जूम ऐप को फुल स्क्रीन मोड से हटाएं, चेहरों को छोटा दिखाने के लिए विंडो के आकार को कम करें और स्क्रीन से दूर बैठें।

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अपने ही चेहरे को देखकर थकावट हो रही
दर्पण में एक दिन में कई बार खुद को देखने और दूसरे लोगों से बात करने के दौरान अपने चेहरे को लगातार देखने में बहुत बड़ा फर्क होता है। वीडियो कॉल में यही होता है। अध्ययनों से पता चला है कि जब हम लगातार स्वयं का प्रतिबिंब देखते हैं तो लोग अपने लिए बहुत आलोचनात्मक हो जाते हैं। ऐसे में वीडियो चैट पर खुद को लगातार देखना इतना थकाऊ होता है। यह तनावपूर्ण है और बहुत सारे शोध में सामने आया है कि खुद को यूं लगातार देखने के भी नकारात्मक और भावनात्मक परिणाम होते हैं।
समाधान: चैट विंडो में अपने आप को छिपा लें।

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स्थिर होकर बैठना और बातें करना प्राकृतिक नहीं
हमारी अधिकांश मीटिंग्स में हम सीट पर स्थिर बैठकर बहुत अनुशासन के बीच बातें करते हैं। लेकिन मानव स्वभाव और दिमाग की कार्यशैली के अनुसार यह नेचुरल नहीं है। एक सीमित क्षेत्र में बहुत ज्यादा हिले-डुले बिना, खुद को फ्रेम में बनाए रखना हमें थका देता है। इस धारणा के पीछे एक वैज्ञानिक आधार भी है कि उठने और चारों ओर घूमने से न्यूरॉन्स अधिक सक्रिय होकर काम करते हैं। एक नए शोध के अनुसार, जब लोग क्रियाशील होते हैं तो वे बेहतर परफॉर्म करते हैं।
समाधान: अपने और कैमरे के बीच जितना हो सके गैप रखें। यदि आप लैपटॉप का उपयोग कर रहे हैं, तो अलग से कीबोर्ड लगाकर काम करें। वीडियो कॉलिंग के लिए ऐसे स्थान को चुनें जहां आप आसानी से चहलकदमी कर सकें जैसे-छत या बरामदा अथवा चौक। इस दौरान कैमरा बंद करके भी बात कर सकते हैं।

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दूसरों की भावनाओं को समझ नहीं पाते
दरअसल, वीडियो कॉलिंग और आमने-सामने की बातचीत में सबसे बड़ा अंतर भावनाओं के आदान-प्रदान का है। आमने-सामने की बाचीतत में हमें तुरंत रिएक्शन या प्रतिक्रिया मिलती है जबकि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग पर ऐसा संभव नहीं होता। हमारा दिमाग आमने-सामने की बातचीत और उससे जुड़े व्यवहार को समझने के लिए अभ्यस्थ है। इतना ज्यादा कि आमतौर पर हमें इस बारे में सोचने की भी जरुरत नहीं पड़ती। लेकिन वीडियो कॉल पर बहुत सोचकर बोलना पड़ता है, कैजुअल रिमाक्र्स के लिए वहां गुंजाइश नहीं होती। ऐसे में हमारा दिमाग थकान महसूस करने लगता है। बार-बार इशारा कर के जैसे सिर हिलाकर या ओके के रूप में अंगूठा दिखाकर अपनी सहमति या असहमति जतानी पड़ती है। इससे दिमाग पर अतिरिक्त बोझ बढ़ता है क्योंकि मानसिक रूप से हमें ज्यादा कैलोरी खर्च करनी पड़ती है।
समाधान: कैमरे को बंद करके अपने आपको ऑडियो मोड पर रखें और खुद को ब्रेक दें। हालांकि, बेलेन्सन का सुझाव है कि इशारों में जवाब देने की बजाय बोलकर ही सहमति या असहमति जताएं।

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