सत्ता की धूप में संाप छछूंदर एक हो गएं...

साहित्य शिल्पी की काव्य निशा का हुआ आयोजन

By: Anil kumar

Published: 03 Dec 2019, 12:13 PM IST

आष्टा.
शहर के सुभाष नगर में साहित्य शिल्पी की मासिक सरस काव्य निशा का आयोजन किया गया। इसमें कवियों ने जब एक से बढ़कर एक कविता सुनाई तो हर कोई सुनते ही रह गया। कवियों की कई कविताओं ने गुदगुदाया तो कई कविता ने सोचने पर भी विमर्श किया।

आयोजन का आरंभ आदित्य गुप्ता ने सरस्वती वंदना और शायर जावेद अली ने इस्लामिक वंदना हम्द के वाचन के साथ किया। कवि दिलीप संचेती ने कविता में कलम को ज्ञान के सीढ़ी के रूप में उल्लेखित किया। मूलचंद धारवां ने जीवन को रेलगाड़ी की उपमा देते हुए अपनी रचना पटल पर रखी, डॉ. प्रशांत जामलिया ने आतंकियों को चेतावनी देते हुए ललकारा कि फैला आतंक हर ओर खुद ही मारे जा रहे हो तुम। कवि गोपीलाल अवलेशिया ने अपनी रचना के माध्यम से सकारात्मक संदेश देते हुए कहा कि आंगन-आंगन दीप जलाओं बाहर बहुत अंधेरा है। डॉं. कैलाश शर्मा ने गजल सुनाई। कन्हैयालाल शर्मा ने महाराष्ट्र की समसामयिक राजनीतिक घटना से जोड़ते हुए व्यंग्य में कहा सत्ता की धूप में संाप छछूंदर एक हो गए।

केचली रोज बदलने लगे
जुगल किशोर पंवार ने कहा तुम नहीं तुम्हारी याद तो हैं। श्याम शर्मा सलिल ने वर्तमान परिस्थितियों को अपनी कविता में रेखांकित करते हुए सुनाया कि केचुली रोज बदलने लगे हैं लोग, सांप से रेंगकर चलने लगे हैं लोग। कवि केपी शर्मा ने यादों को झरोखा नाम से एक कविता प्रस्तुत की। शैलेष शर्मा ने कौमी एकता का गीत प्रस्तुत करते हुए सुनाया कि सीने पे गोली जय हिन्द की बोली, एकता का वो भारत याद आया। ललित बनवट ने रचनाओं का पाठ किया। कवि अतुल जैन सुराणा ने अपनी गजल के माध्यम से कहा कि वो दौलत में खुश है, मकानों में खुश है, हम तो मगर इत्मीनानों में खुश हैं। शायद जावेद नें तरन्नुम में पढ़ा कि मेरे बस में हो ये हालात कर दूं, हरि नाम तेरे ये दिन रात कर दूं। कवि घनघोर ने तरन्नुम में सुनाया कि गांधी की कभी राम की चादर को ओढ़कर, मेरे वतन को इस तरह खाते रहे हैं लोग। श्रीराम श्रीवादी ने बड़े-बड़े भी कई खाली हाथ मलते हैं, गुरूर इतना लिए क्यों जहां में चलते हैं सुनाई तो पूरा सदन तालियों से गूंज उठा। इस अवसर पर हनीफ अंसारी, भवानी प्रसाद शर्मा, हरिओम कटारिया, राजेन्द्र वर्मा, धर्मेन्द्र वर्मा थे।

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Anil kumar Reporting
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