लंबे संघर्ष के बाद होम्योपैथिक पद्धति को पहचान दिलाई हैनिमैन ने

जिस शहर में की शुरुआत वहां दवा पर लगा प्रतिबंध, निकाला गया था शहर से

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Updated: 10 Apr 2019, 12:05 PM IST

सिवनी. होम्योपैथिक पद्धति के जन्मदाता सैमुएल हैनिमैन का जन्म सन 1755 में हुआ था। वह यूरोप देश जर्मनी के निवासी थे। वे शुरू में ऐलोपैथी के चिकित्सक थे। उनके पिता एक पेंटर थे। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। उनका बचपन गरीबी में बीता। यह बात होम्योपैथिक चिकित्सक डॉ. अश्वनी भलावी और डॉ. भूपेंद्र मिश्रा ने संयुक्त रूप से कही। दोनों ने बुधवार (१० अप्रैल) को विश्व होम्योपैथिक दिवस पर इसके जन्मदाता के बारे में विस्तृत रूप से बताया।
कहा कि हैनिमैन को स्कूली शिक्षा और मेडिकल की पढ़ाई करने में अनेकों कठिनाई से गुजरना पड़ा। मेडिकल की पढ़ाई में एक अध्यापक ने उनका सहयोग किया था। पढ़ाई के बाद वे प्रेक्टिस करने के लिए गांव-गांव जाते थे। प्रेक्टिस के दौरान उनको उस समय की चिकित्सा प्रणाली अच्छी नहीं लगी। उन्होंने प्रेक्टिस छोड़कर शादी कर ली। जीविका चलाने के लिए किताबों का अंग्रेजी से जर्मनी में अनुवाद करने लगे। एक बार वे डॉक्टर कलेन की लिखी किताब का जर्मनी भाषा में अनुवाद कर रहे थे तो उन्हें एक कुनेन नाम की जड़ी के बारे में पता चला। वह जड़ी मलेरिया जैसे रोगों को खत्म करती, लेकिन इसका उपयोग अगर स्वस्थ्य व्यक्ति पर किया जाए तो उसमें मलेरिया जैसे लक्षण होने लगते। उन्होंने सबसे पहले इसका शोध अपने ऊपर किया। उन्होंने जब इसका उपयोग किया तो पाया कि उनमें मलेरिया जैसे लक्षण हैं लेकिन जैसे ही उन्होंने इस जड़ी को खाना बंद किया वह एकदम सही हो गए। उन्होंने अपने दोस्त पर भी जड़ी का उपयोग किया तो उसके साथ वैसा ही हुआ। इस तरह उनको शोध करने का जरिया मिल गया। उन्होंने बहुत सारी जड़ी का प्रयोग अपने ऊपर किया और उनके तरह-तरह के निष्कर्ष निकाले। उन्होंने अपने किए गए शोधो को लिखना शुरू किया। अपने सभी शोध को एक पत्रिका में प्रकाशित करवाया। उनके परीक्षण का लोगों को लाभ मिला, लेकिन कुछ समय बाद उनकी बनाई गई दवा के तरीकों पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई। उनको शहर से निकाल दिया गया। उस समय उनको बहुत सी मुसीबतों का सामना करना पड़ा। वे दूसरे शहर चले गए वहां पर अपने प्रयोगों को जारी रखा। उनको वहां पर दवा बनाने की इजाजत मिल गई। सन 1831 में इन्हें होम्योपैथी की दवाओं में सफलता मिली। कुछ समय बाद पहला होम्योपैथिक अस्पताल खुला। उस अस्पताल में वे अपना सहयोग देते और रोगी व्यक्तियों को दवाओं से लाभान्वित करवाते थे। लेकिन कुछ समय बाद अस्पताल बंद हो गया। ८० साल के बाद वे फ्रांस गए और वहां पर होम्योपैथिक दवाओं को जारी रखा। सन १८४३ में उनकी मौत हो गई।

विश्व में दूसरे नंबर पर प्रसिद्धि में है होम्योपैथिक पद्धति
होम्योपैथिक चिकित्सक डॉ. भूपेंद्र मिश्रा व डॉ. अश्वनी भलावी ने बताया कि वर्तमान में गंभीर बीमारियों से लेकर लोग लाइफ स्टाइल डिसीसिस तक के इलाज के लिए होम्योपैथिक पद्धति से उपचार ले रहे हैं। यह पद्धति पूरी दुनिया में प्रसिद्धि के मामले में दूसरे नंबर पर है। यदि सही तरीके से मरीज की टेस्टिंग कर उपचार किया जाए तो उसकी बीमारी को जड़ से ठीक किया जा सकता है। वर्तमान में दुनियाभर में उक्त पद्धति से सभी रोगों का इलाज किया जा रहा है।

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