कृषि वैज्ञानिक बता रहे नरवाई से खेती को नुकसान

कृषि वैज्ञानिक बता रहे नरवाई से खेती को नुकसान

Sunil Vandewar | Publish: Apr, 23 2019 09:45:20 PM (IST) | Updated: Apr, 23 2019 09:45:21 PM (IST) Seoni, Seoni, Madhya Pradesh, India

रोक के बाद भी किसान जला रहे नरवाई

सिवनी. शासन-प्रशासन नरवाई न जलाने के लिए लगातार किसानों को अवगत करा रहा है। ऐसा किए जाने पर कार्रवाई की चेतावनी भी दी जा रही है, लेकिन कहीं-कहीं अब भी किसान नरवाई पर आग लगाकर दूसरे किसानों के लिए समस्या खड़ी कर रहे हैं। ऐसी ही स्थिति केवलारी विकासखण्ड के खैरापलारी, लोपा, पांजरा, ढुटेरा, सरेखा, कंडीपार, मैरा, समनापुर, चंदनवाड़ा, बरसला व अन्य क्षेत्रों में नजर आ रही है।
नरवाई जलाने से नष्ट होती है मिट्टी की शक्ति -
किसानों को जागरुक करते हुए कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार जिन कृषकों के खेतों पर गेंहू की फसल पक कर कटाई हेतु तैयार है। ऐसे किसान कटाई के लिए कम्बाइन हारवेस्टर मशीन से कटाई करने के उपरंात गेहूं के अवशेष नरवाई को आग न लगाएं, बल्कि कृषक इन अवशेषों को कटाई के उपरांत रोटावेटर से जुताई करके एक पानी लगा देवें तो फसलों के अवशेष मिट्टी में मिल जाते हैं साथ ही 20-35 कि.ग्रा. यूरिया प्रति हेक्टेयर की दर से डाल देने से अवशेषों के विगलन की प्रक्रिया तीव्र हो जाती है अथवा गेंहू फसल कटाई के बाद जल की कमी वाले खेतों में फसल के अवशेषों नरवाई पर कचरा अपघटक वेस्ट डीकम्पोजर या बायोडायजेस्टर का घोल तैयार कर खेत में छिडकाव एवं जब किसान खेत में सिंचाई करेंगे तो विघटन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। किसी भी दृष्टिकोण से फसल अवशेष नरवाई को जलाना उचित नहीं है। इसलिए किसानों से कृषि वैज्ञानिकों द्वारा कहा जा रहा हैै कि अपनी मृदा की उर्वरा शक्ति एवं पशुओं की सेहत का ख्याल रखने के साथ ही पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के लिए फसल अवशेष नरवाई को आग न लगाएं एवं कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों की सलाह पर ध्यान देवें।
नरवाई जलाने से ये है हानि-
कृषि वैज्ञानिक एनके सिंह के मुताबिक नरवाई जलाने से भूमि की उर्वरक शक्ति में कमी होती है। खेत में उपलब्ध मूल्यवान कार्बनिक पदार्थो का ह्रास होता है। मृदा में पाये जाने वाले सूक्ष्मजीवों को नुकसान होता है। मिट्टी की उपरी सतह पर रहने वाले मित्र कीट एवं केंचुआ आदि नष्ट हो जाते हैं। नरवाई के जलाने से प्रक्षेत्र की जैव विविधता को नुकसान पहुंंचता है। मृदा की उपरी परत कड़ी होने से वायु संचार एवं जल अवषोषण की समस्या बनती है। आग से पर्यावरण व स्थानीय पशु, पक्षी एवं जीव जंतुओं को अत्यधिक नुकसान होता है।

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