ग्लेण्डर बीमारी से बचने चिकित्सकों ने दी सलाह

घोड़े प्रजाति के संक्रमित प्राणियों के सम्पर्क में आने से फैलती है बीमारी

By: santosh dubey

Published: 07 Jun 2018, 01:00 PM IST

सिवनी. मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी सिवनी ने बताया कि ग्लेण्डर नामक बीमारी मनुष्यों में होने की सूचना अन्य प्रदेशों से आयी है जिसकी रोकथाम के लिए जिला स्तर पर बैठक का आयोजन स्वास्थ्य विभाग के चिकित्साधिकारी एवं पशु चिकित्सा विभाग के अधिकारियों के समन्वय में किया गया।
सीएमएचओ डॉ. केसी मेश्राम ने बताया कि ग्लेण्डर बीमारी से ग्रसित घोड़े, गधे, खच्चर के संपर्क में मनुष्यों के आने से होती है। यह पशुओं में होने वाला जुनोटिक रोग है जो इन पशुओं से मनुष्य में फैल सकता है। जिसका वैक्टीरिया बुरखोल्डिया मैलियस मनुष्यों मे गंभीर संक्रमण रोग उत्पन्न कर सकता है। हालांकि मनुष्यों में ग्लेण्डर बीमारी के प्रकरण बहुत ही कम हुए हैं परन्तु फिर भी घोड़ों की देखभाल करने वाले घोड़ा मालिक इसके निकट संपर्क आने वाले तांगा चालक संक्रमित पशु उपचार करने वाले पशु चिकित्सक, चमड़ा निकालने वाले चर्मकार व अन्य कोई भी मनुष्य जो कि संक्रमित पशुओं के निकट संपर्क में रहता हो उन्हें इस रोग के संक्रमण की संभावना ज्यादा होती है। यह रोग संक्रमित पशुओं की लार (स्लाइवा) नेजल्स डिस्चार्ज या अन्य उत्सर्जनों से सीधे संपर्क में आने से प्रत्यक्ष रूप से तथा दूषित पानी मिट्टी चारे के संपर्क में आने से अप्रत्यक्ष रूप से संक्रमित हो सकते हैं। ठंड लगना बुखार आना मांस पेशियों में अकडऩ, सीने में दर्द, सिर दर्द, नाक बहना, प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता आदि इस बीमारी के लक्षण है।
चूंकि ग्लेण्डर्स एक दुलर्भ किस्म का संक्रमण है तथा कई अन्य रोगों से लाक्षणिक समानता रखता है। इस कारण इसकी पुष्टि सिरोलोजिकल परीक्षण एवं बीमारी फैलाने वाले कारक बैक्टीरिया के आईसोलेशन से ही हो पाती है अत: इस बीमारी से ग्रसित पशु एवं संदेहास्पद व्यक्तियों के ब्लड सेपल जांच के लिए भारतीय अश्व अनुसंधान केन्द्र हिसार तथा मेरठ में भेजे जाते है। जिले में लगभग 220 घोड़े हैं जिनमें सेे पांच विकासखण्डों में 13 संभावित घोड़ो के रक्त सेपंल लेकर जांच के लिए हिसार प्रयोगशाला में भेजे गए थे। सभी सेंपल निगेटिव प्राप्त हुए हैं। वहीं पड़ोसी जिला नरसिंहपुर के गोटेगांव के दो घोड़ो के सेंपल ग्लेण्डर रोग पाजिटिव प्राप्त हुआ है तथा भोपाल में भी एक सेंपल पाजिटिव प्राप्त हुआ है। पड़ोसी जिला होने के कारण इस जिले में रोग के फैलने की संभावना हो सकती है।
इस बीमारी का वर्तमान में ऐटी बायोटिक के द्वारा उपचार किया जाता है कितु वे भी कई बार प्रभावी नही होते है। अत: इस रोग को पशुओं से मनुष्य में फैलने से रोकना अति आवश्यक है। डॉक्टरों ने कहा है कि इस रोग से बचने के लिए अश्व, कुलो जैसे गधे, घोडे, खच्चर, टट्टू आदि जानवरों से दूरी बनाए रखें।
समन्वय बैठक में उपसंचालक पशु चिकित्सा डॉ पीके शर्मा, लैब प्रभारी पशु चिकित्सा विभाग डॉ संतोष डेहरिया, नोडल अधिकारी डॉ. एमएस धर्डे, डीएचओ-1 डॉ. पी सिरसाम, डीएचओ-2 डॉ. एके तिवारी, डॉ. प्रसून श्रीवास्तव, डॉ. एसएच श्रीवास्तव, डॉ. जायज काकोडिया, एसके भोयर जिला मीडिया अधिकारी, डॉ. निर्मला पाण्डेय प्रभारी आईडीपीएसपी, धीरज पाल कम्प्यूटर ऑपरेटर मौजूद थे।

santosh dubey Reporting
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