नरवाई की आग में नष्ट हो रहा पर्यावरण

Santosh Dubey

Updated: 21 May 2019, 01:34:49 PM (IST)

seoni

सिवनी. पृथ्वी में होने वाले अन्न, फल, साग-सब्जी पर सभी का अधिकार होता है और अच्छे व खराब आनाज को जीव-जन्तु खाकर प्राकृतिक के चक्र को पूरा करके हुए पर्यावरण संतुलन में इन असंख्य छोटे-बड़े जीवाणु, जीव-जन्तु का अपना विशेष महत्व होता है। लेकिन बीते कुछ सालों से सभी का पेट भरने वाले अधिकांश अन्नदाता अब फसल कटाई के बाद नरवाई को आग के हवाले करके पर्यावरण को धीरे-धीरे नष्ट कर रहे हैं। कृषि वैज्ञानिकों ने भविष्य की चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि यह बिगड़ते पर्यावरण की भयावह स्थिति को जन्म देने की शुरूआत है। समय रहते ग्रामीण, अन्नदाता इस पर गंभीर नहीं हुए है तो समूची मानव सभ्यता को इसका घातक परिणाम भुगतना पड़ेगा।
गेहूं धान आदि फसलों की कम्बाइन हार्वेस्टर की कटाई उपरांत अधिकांश फसलों के अवशेष या नरवाई खेत में रह जाती है, जिसे जलाया नहीं जाना चाहिए। नरवाई जलाने से खेतों में मौजूद लाभदायक मित्र कीट नष्ट हो रहे हैं। साथ ही मिट्टी का तापक्रम बढऩे से उर्वरा शक्ति भी नष्ट हो रही है। मिट्टी सख्त हो रही है। खेतों के किनारे मेढ़ों में लगे छोटे-बड़े पौधे भी नष्ट आग की तपिस से झुलस कर नष्ट हो रहे हैं। पेड़ों पर चिडिय़ों के घोसले और अंडे जलकर नष्ट हो रहे हैं। नरवाई जलाने से सख्त होती खेतों की मिट्टी से जुताई करने पर अधिक मेहनत लगती है और डीजल की लागत भी बढ़ जाती है। इसके साथ ही मिट्टी की जल धारण क्षमता भी कम हो रही है। वहीं नरवाई जलाने से मिट्टी के कार्बन की मात्रा कम हो रही है जबकि उपजाऊपन के लिए कार्बन की मात्रा का होना लाभदायक है।
इसके साथ ही नरवाई के जलाने से निकलने वाले धुआं, जले हुए अवशेष भी पर्यावरण के संतुलन को बिगाड़ रहे हैं। जले हुए घास के कण हवा में उड़कर काफी दूर तक लोगों के घरों के आंगन, छतों में भी नजर आ रहे हैं।
वहीं कृषि अधिकारी ने बताया कि नरवाई की आग तेज हवाओं के चलने से आग तेजी से फैलती हुई खेतों के आसपास बने घरों, मवेशियों के कोठे व वहां रखे कृषि उपकरणों को भी अपने अपने आगोश में ले लेती है। इससे किसानों का लाखों का नुकसान भी हो रहा है। कृषि अधिकारी ने बताया कि नरवाई को जलाने के स्थान पर स्ट्रिपल यंत्र (भूसा बनाने की मशीन) से भूसा बनाना चाहिए या फिर रोटावेटर आदि यंत्रों का उपयोग कर मिट्टी में मिला देना चाहिए। मिट्टी में मिलने से फसल अवशेष सड़कर कार्बनिक पदार्थ में बदल जाते हैं। जिससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति में वृद्धि होती है।
खेतों में फसल कटाई के बाद बचे अवशेषों और डंठलों को एकत्रित करके जैविक खाद जैसे भू-नाडेप, वर्मी कम्पोस्ट आदि बनाने में उपयोग किया जा सकता है। ये जल्दी सड़कर पौषक तत्वों से भरपूर पोषक खाद बना देते हैं। खेत में कल्टीवेटर, रोटावेटर या ***** हैरो आदि की सहायता से फसल अवशेषों को भूमि में मिलने से आने वाली फसलों में जैवांश खाद की बचत की जा सकती है।
अवशेष जलाने से होता है अनेक नुकसान
फसल अवशेष जलाने से वातावरण में कार्बनडॉईऑक्साइड, मिथेन, कार्बन मोनोऑक्साइड आदि गैसों की मात्रा बढ़ जाती है। मृता की सतह का तापमान 50-55 डिग्रीसेंटीग्रेट हो जाता है। ऐसी दशा में मिट्टी में पाए जाने वाले लाभदायक जीवाणु जैसे वैसीलस सबटिलिस, स्यूडोमोनास ल्यूरोसेन्स, एग्रोवैक्टीरियस, रेडियो वैक्टर, राइजोवियस प्रजाति, एजोटोवैक्टर प्रजाति, एजोस्प्रिलम प्रजाति, सेराटिया प्रजाति, क्लेब्सीला प्रजाति, वैरियोवोरेक्स प्रजाति आदि नष्ट हो जाते हैं। ये सूक्ष्म जीवाणु खेतों में डाले गए खाद एवं उर्वरक को तत्व के रूप में घुलनशील बनाकर पौधों को उपलब्ध कराते हैं। अवशेषों को जलाने से ये सभी सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते है। इन्हीं सूक्ष्य जीवों के नष्ट हो जाने से उत्पादन भी प्रभावित होता है।
उत्पादन हो रहा प्रभावित
इसी प्रकार मिट्टी में लाभदायक फफूंद जैसे ट्राइकोडर्मा, हारजिएनम, ट्राइकोडमा स्पेरेलस, मेटारइजीयस एनीसोल्पी, अर्थोबोट्रायस रोबस्टा आदि भी नष्ट हो जाते हैं। इन सूक्ष्म फफूंद मिट्टी में पाए जाने वाले उकठा रोग, जड़ सडऩ, कॉलर सडऩ, पाद गलन रोग के कारकों तथा सूत्रकृमियों को प्राकृतिक रूप से नष्ट करते हैं। इन्हीं सूक्ष्म जीवों के नष्ट हो जाने से उत्पादन भी प्रभावित हो रहा है।

इनका कहना है
किसान भाई जो नरवाई जला रहे हैं इससे पर्यावरण को बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है। मिट्टी के पौषक तत्व, मित्र कीट आदि खत्म हो रहे हैं।
डॉ. एनके सिंग, कृषि वैज्ञानिक
कृषि विज्ञान केंद्र, सिवनी

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