सौभाग्य, संतान की प्राप्ति के लिए महिलाओं ने की वट सावित्री की पूजा

शहर और गांव में महिलाओं ने की पूजा

By: santosh dubey

Published: 16 May 2018, 01:00 PM IST

सिवनी. वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ माह में कृष्ण पक्ष की अमावस्या को मंगलवार के दिन जिले भर में मनाया गया। महिलाएं अपने सौभाग्य की कामना एवं संतान प्राप्ति के लिए वट वृक्ष की पूजन करने पहुंची। भारतीय संस्कृति में वट सावित्री व्रत आदर्श नारीत्व का प्रतीक माना गया है।
वट सावित्री पूजा महत्व
पं. राघवेन्द्र शास्त्री ने बताया कि पीपल की भांति वट,बरगद वृक्ष का भी विशेष महत्व है। इस व्रत को करने से सौभाग्य एवं संतान की प्राप्ति होती है। धार्मिक मान्यता अनुसार वट वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश का वास होता है। वट वृक्ष के नीचे बैठकर पूजन, व्रत कथा सुनने से समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती है।
उन्होंने बताया कि वट सावित्री व्रत के दिन मां सावित्री के साथ यम देव की भी पूजा की गई। सावित्री ने इस तिथि को मृतक पति को धर्मराज यम से पुन: जीवित करने का वर प्राप्त किया था। जिससे सावित्री का पति सत्यवान जीवित हो उठा था। इस दिन व्रत करने वाली महिलाओं ने मिट्टी से निर्मित मां सावित्री तथा यमराज की प्रतिमा का पूजन विधि-विधान पूर्वक की। वट, बरगद, वृक्ष के नीचे मां सावित्री की पूजा रोली, केसर, सिंदूर, धुप-चन्दन आदि से करके सती सावित्री की कथा सुनी।
शास्त्री ने बताया कि स्कन्द पुराण के अनुसार, भद्र देश के राजा अश्वपति की कोई संतान न थी जिस कारण राजा अश्वपति सदैव कुण्ठित रहते थे। तत्पश्चात उन्होंने अपने राज्य पुरोहित से इस संदर्भ में कोई माध्यम बताने का अनुरोध किया। राज्य पुरोहित ने कहा, हे राजन आप सावित्री देवी की पूजा करें।
मां सावित्री प्रसन्न होकर आपको मनोवांछित वर अवश्य देंगी। राजा अश्वपति ने संतान प्राप्ति के लिए कई वर्षो तक तपस्या की जिससे मां सावित्री अति प्रसन्न हुई। मां सावित्री ने प्रकट होकर उन्हें पुत्री प्राप्ति का आशीर्वाद दिया। तदोपरांत राजा अश्वपति के घर में पुत्री का जन्म हुआ। राजा अश्वपति ने माँ सावित्री के नाम पर अपनी पुत्री का भी नाम सावित्री रखा। समय के साथ सावित्री बड़ी होती गई। सावित्री सब गुणों से सम्पन्न कन्या थी। जिस कारण राजा अश्वपति को सावित्री के योग्य वर नही मिल पा रहा था। कुछ समय पश्चात राजा ने सावित्री को स्वंय वर तलाशने के लिए कहा। सावित्री अपने वर की तलाश में एक वन में जा पहुंची जहां उसकी भेंट साल्व देश के राजा दयुम्त्सेन से होती है।
दयुम्त्सेन का राज पाठ छिन गया था जिस कारण साल्व का राजा अपने परिवार सहित उसी वन में रहते थे। सावित्री ने जब राजा के पुत्र सत्यवान को देखा तो सावित्री ने उन्हें पति रूप में वरण कर लिया। यह बात जब महर्षि नारद को ज्ञात हुई तो उन्होंने इस सदर्भ में राजा अश्वपति को बताया कि आपकी कन्या को वर ढूंढने में भारी भूल हुई है। राजकुमार सत्यवान गुणवान तथा धर्मात्मा है परन्तु सत्यवान अल्पायु है एवं एक वर्ष पश्चात इनकी मृत्यु हो जाएगी। जिससे राजा अश्वपति पुन: चिंतित हो गए। उन्होंने अपनी बेटी सावित्री को समझाया कि कोई और वर चुन लो। तत्पश्चात सावित्री बोलीए पिता जी आर्य कन्याए अपने पति का वरण सिर्फ एक बार करती है तथा कन्यादान भी एक बार ही किया जाता है। अब भगवान की जो इच्छा हो, मैं सत्यवान की ही अर्धांग्नी बनूंगी। तत्पश्चात राजा अश्वपति ने दोनों को परिणय सूत्र में बांध दिया। सावित्री ससुराल पहुंच कर सास-ससुर की सेवा में रत हो गयी। समय के साथ वो दिन भी आ गया जिस दिन राजकुमार की मृत्यु विधि के विधान के अंतर्गत सुनिश्चित थी। सत्यवान उस दिन भी जंगल में लकड़ी काटने चला गया। सावित्री भी अपने सास-ससुर से आज्ञा लेकर अपने पति के पास पहुंच गयी। सत्यवान वृक्ष पर चढ़ कर जैसे ही लकड़ी काटने लगाए तभी सत्यवान का सर चकराने लगाए वह तुरंत वृक्ष से नीचे उतर आया। उस समय सावित्री ने उसे अपने गोद में सुला लिया, तभी यम आकार सत्यवान के जीवन को लेकर जाने लगा तब सावित्री भी उसके पीछे.पीछे चल दी। यम ने मुड़कर सावित्री को जाने को कहाए सावित्री फिर भी चलती रही।
तत्पश्चात यम ने कहा तुम्हे क्या चाहिए? मनवांछित फल ले लो परन्तु सत्यवान को जाने दो। सावित्री ने अपने सास-ससुर की काया तथा राज पाट मांग ली। यम ने कहा ऐसा ही होगा। फिर यम आगे बढ़ा तो सावित्री भी पीछे-पीछे चलती रही। यम ने फिर मुड़कर सावित्री को जाने के लिए कहा। सावित्री बोली मैं साथ में जाउंगी। यम ने कहा, तुम्हे और क्या चाहिए?
सावित्री बोली, मुझे सौ पुत्रो की माँ बनना है। यम ने कहा तथास्तु ! फिर भी सावित्री यम के पीछे चलती रही। यम ने कहा अब क्या चाहिए? तुम्हारे कहे अनुसार मैंने तुम्हे वर दे दिया अब लौट जाओ। सावित्री बोली, हे यम देव पत्नीव्रता के कर्तव्य का निर्वाह कर रही हूँ। आपने तो सौ पुत्रो की माँ बनने का वरदान दे दिया परन्तु मैं पति के बिना माँ कैसे बनूँगी। अत: आप अपने दिए गए वरदान को पूरा करें। तत्पश्चात यम सत्यवान के प्राण को पाश से मुक्त कर दिया। सावित्री अपने पति के प्राण को लेकर उस वृक्ष के नीचे पहुंची तब सत्यवान जीवित हो उठा। दोनों हर्षित होकर अपने माता-पिता के पास पहुंच कर उन्होंने देखा की माता-पिता को दिव्य ज्योति प्राप्त हो गई है। चिरकाल तक सावित्री तथा सत्यवान सुख भोगते रहे।

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santosh dubey Reporting
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