मास्टरजी ने कहा स्कूल नहीं आए बच्चे, बीन रहे हैं महुआ...

मास्टरजी ने कहा स्कूल नहीं आए बच्चे, बीन रहे हैं महुआ...

Sunil Vandewar | Publish: Apr, 24 2019 11:54:56 AM (IST) Seoni, Seoni, Madhya Pradesh, India

खापा, सुकरी, गोरखपुर के स्कूल में नहीं पहुंचे विद्यार्थी

सुनील बंदेवार सिवनी. जिले के 2878 सरकारी प्राथमिक और माध्यमिक शालाओं पर हर महीना करोड़ों रूपए खर्च हो रहे हैं, ताकि हर बच्चा शिक्षित हो, लेकिन जमीनी हकीकत चिंताजनक दिखा दे रही है। निरीक्षण के दौरान जब अधिकारी स्कूलों पर पहुंचे तो कई जगह सिर्फ शिक्षक ही मिले, जब उनसे पूछा गया कि बच्चे कहां हैं, तो बताया गया कि बच्चे तो स्कूल नहीं आए, महुआ बीनने गए हैं।
छपारा बीआरसीसी गोविंद उइके ने बताया कि जब औचक निरीक्षण पर ब्लॉक के प्राथमिक शाला गोरखपुर, प्राथमिक शाला खापा, प्राथमिक शाला सुकरी गए थे। तब कोई भी विद्यार्थी मौके पर नहीं मिला था। सिर्फ शिक्षक ही शाला में बैठे पाए गए। बच्चों के स्कूल नहीं आने की वजह जानने जब बीआरसीसी ने शिक्षकों से पूछा तो बताया गया कि महुआ का सीजन है और बच्चे महुआ बीनने में लगे हैं, इसलिए स्कूल नहीं आ रहे हैं। बीआरसीसी ने ऐसा जबाव देने वाले शिक्षकों को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि क्यों नहीं शिक्षकों ने गांव जाकर अभिभावकों को प्रेरित बच्चों को स्कूल लाने के प्रयास किए।
इधर कम संख्या में आए विद्यार्थी -
इन स्कूलों के अलावा प्राथमिक शाला कड़वी, प्राथमिक व माध्यमिक शाला अंजनिया, प्राथमिक व माध्यमिक शाला भीमगढ़ कालोनी का निरीक्षण किया। इन शालाओं में भी विद्यार्थियों की कम उपस्थिति रही। बच्चों के न आने की वजह बता रहे शिक्षकों में कुछ ऐसे भी मिले जिन्होंने बताया कि बीते दो दिन की छुट्टी के कारण बच्चे स्कूल नहीं आए। बीआरसीसी ने सभी स्कूलों को निर्देशित किया है कि पालक संपर्क पंजी रजिस्टर बनाएं और प्रतिदिन बच्चों को लेकर आने के लिए कहा है। निरीक्षण के दौरान बीआरसीसी के साथ जनशिक्षक प्रकाश श्रीवास्तव, राजेश ठाकरे व अन्य उपस्थित रहे।
क्रियान्वयन नहीं हो रहा सही -
शिक्षक संघ के जिला सचिव अविनाश पाठक ने वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाते कहा कि जिले के दूरस्थ ग्रामीण अंचल के मजरे-टोले तक सरकारी स्कूल चल रहे हैं। इनके लिए प्रदेश स्तर से योजनाएं संचालित हो रही हैं। योजनाओं पर बिना जमीनी हकीकत जाने करोड़ों रुपए खर्च हो रहे हैं। योजनाओं का सही क्रियान्वयन नहीं हो रहा है। इससे उद्देश्य पूरा नहीं हो पा रहा है। जॉयफुल लर्निंग के नाम पर एक-एक हजार रुपए प्रति शाला मिले हैं, लेकिन इनका भी पूरा उपयोग नहीं हुआ। कहा कि जरूरत है, जमीनी हकीकत को जानकर योजना बनाएं, तो परिणाम भी बेहतर मिलेंगे।

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