पर्वराज पर्युषण, अपेक्षा ही तो है असंयम का कारण

पर्वराज पर्युषण, अपेक्षा ही तो है असंयम का कारण

Sunil Vandewar | Publish: Sep, 20 2018 01:01:01 PM (IST) Seoni, Madhya Pradesh, India

पयुर्षण पर्व पर हो रहा श्रावक संस्कार शिविर का आयोजन

सिवनी. दिगंबर जैन समाज के दसलक्षण पर्वराज पर्युषण जारी है। दिगम्बर जैन मंदिर में चातुर्मास कर रहे मुनि अजित सागर, ऐलक दया सागर, ऐलक विवेकानंद सागर महाराज के सानिध्य में श्रावक संस्कार शिविर आयोजित हो रहा है। बुधवार को सुबह अभिषेक शांतिधारा पूजन, श्रीजी का पूजन हुआ। अभिषेक पूजन के पश्चात विराजमान तीनों महाराज ने दसलक्षण धर्म के षष्टम दिवस उत्तम संयम धर्म मे उपदेश दिया।
ऐलक विवेकानंद सागर महाराज ने कहा अनुशाशन सुख का साधन, लापरवाही एवं अव्यवस्थित जीवन को व्यवस्थित करना ही संयम है। ख्याति लाभ पूजा उत्तरोत्तर तृष्णा से रहित अपने मन इन्द्रियों पर अनुशासन करना संयम है। जीवन भर के लिए बुरी आदतों को मर्यादित जीवन जीना संयम है। हर वस्तु मर्यादा में ही श्रेष्ठ लगती है। मर्यादा से रहित हर प्रवृत्ति स्वपर दु:ख का कारण होती है। आसक्ति और आवश्यकता में अन्तर करना चाहिए, क्योकि आवश्यकता की पूर्ति तो गरीबों की भी हो जाती है पर आसक्ति तो चक्रवर्ती की पूरी नही होती।
मुनि अजित सागर ने कहा श्रेष्ठता संयम से है। इस संसार मे कर्म-कर्म का हित चाहता है, जीव-जीव का हित चाहता है। अपेक्षा ही तो असंयम का कारण है। जिन्हें अपनी आत्म कल्याण की चिंता होती है वे सदैव असंयम से बचते है 12 प्रकार की प्रवृत्तियों से असंयम आता है 5 इन्द्रिय एवं मन का व्यवस्थित न होना साथ 5 स्थावर एवं त्रय हिंसा करना ये असंयम है। जहाँ परिग्रह होता है वहाँ नियम से असंयम होता है। इसलिए इन इन्द्रिय विषयों पर विचार करें इनसे कभी सुख नही मिलता है। घोड़ा और ***** में सिर्फ इतना अंतर है कि लगाम नही है गधे में पर घोड़े में लगाम होती है।
घोड़ा सफाई पसंद है पर ***** गंदगी पसंद करता है, ऐसा ही मानव का जीवन है। जो संयम से रहित वह गधे के समान है असंयमी स्वपर को दु:ख का कारण बनता है अत: किसी भी विषय से इंद्रिया तृप्त नहीं होती है। इन्द्रिय और मन तो समुद्र जैसे है जो कभी तृप्त नही होते। जो व्यक्ति निरंतर अव्यवस्थित जीवन खाने पीने में ही खो देता है वह नास्तिक है, संसार में सुख नही है, यह तो निस्सार है। केले के वृक्ष के समान प्याज के छिलके के समान सारहीन है। असंयमी नियम से श्रद्धा समर्पण से रहित होता है पारा धातु के समान असंयमी जीवन है जिसे पकड़ा नही जाता है अत: अनादि काल से बहुत भटके अब तो अपने को मर्यादाओ से बाँधो अपनी चर्या को समयबद्ध करो श्रावक अष्ठ मूल का पालन करे साधु 28 मूलगुण का पालन करते है कर्म एवं कर्म फल पर बार बार विचार करने से संयम आता है। मन को संतो की वाणी में विचार करने से संयम आता है। मन को संतो की वाणी में लगाकर अपनी आदतों को मर्यादित करते हुए कल्याण अनेक रोचक उदाहरणों से संबोधित किया।
महाराज ने कहा उत्तम संयम के पावन दिवस पर श्रावक श्रेष्ठी सनत कुमार, सुधीर कुमार, सुबोध बाझल परिवार एवं केतन जैन, राजेश बागड़ परिवार को प्राप्त हुआ। शांतिधारा करने का सौभाग्य रविन्द्र, पवन एवं बाझल परिवार को प्राप्त हुआ। प्रश्न मंच पुण्यार्जक विजय जैन शिखर वालों को प्राप्त हुआ। रात्रि में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करने के लिए दिल्ली से आए कंठस्थ कला केंद्र के कलाकार अलग-अलग जैन नाटिका के माध्यम से सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति शुक्रवार के राम मंदिर के बाजू वाले प्रांगण में रात्रि 9 बजे से प्रस्तुति दे रहे हंै।

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