यहां पढऩे आते थे पोथीराम, अब हैं स्वामी शंकराचार्य महाराज, ऐसे बीता बचपन

Sunil Vandewar

Publish: May, 19 2019 02:47:03 PM (IST)

Seoni, Seoni, Madhya Pradesh, India

सिवनी. शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती महाराज जब अपनी प्राथमिक शिक्षा स्थली मुंगवानीकला गांव पहुंचे और वहां के दस्तावेजों में दर्ज अपने बाल्यकाल का नाम, पिता के हस्ताक्षर और पुरानी स्मृतियों को प्रत्यक्ष देखा तो भाव-विभोर व आनंदित हो उठे। पोथीराम से शंकराचार्य बनने तक की शिक्षा, तप और त्याग का स्मरण कर उन्होंने बदलते शिक्षा के मायने पर चिंता व्यक्त की। प्राचार्य ने बताया कि शंकराचार्य महाराज की उत्सुकता इसी बात से समझी जा सकती है कि निर्धारित कार्यक्रम शनिवार को होना था, लेकिन उन्होंने एक दिन पूर्व शुक्रवार को ही शिष्यों को चलने के लिए कहा, तब तत्काल में सभी जरूरी व्यवस्थाएं बनाई गईं।
सिवनी विकासखण्ड मुख्यालय से करीब १६ किमी दूर ग्राम मुंगवानी कला स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में शंकराचार्य महाराज पहुंचे। इस दौरान यहां के प्रभारी प्राचार्य सुनील तिवारी ने शंकराचार्य महाराज को उनकी प्राथमिक शिक्षा से जुड़े कुछ दस्तावेज दिखाए। महाराज ने दाखिल पंजी में अपना नाम देखकर और पिताजी के हस्ताक्षर देखकर अति प्रसन्न हुए और स्कूल प्रबंधक को बहुत-बहुत शुभकामनाएं दी।
प्राचार्य ने बताया कि शंकराचार्य स्वामी यानि बाल्यकाल के पोथीराम की प्राथमिक शिक्षा मुंगवानी कला स्कूल में हुई है। ग्राम वासी एवं स्कूल प्रबन्धन समिति विगत ०2 वर्षों से महाराज के संपर्क में रहे हैं और शुक्रवार को महाराज सहर्ष विद्यालय में आए और अपनी पुरानी यादों को देख भाव-विभोर हो गए। बताया कि दाखिल-खारिज क्रमांक १५१९ में वर्ष १९२९ में दर्ज रिकार्ड अनुसार यहां पोथीराम पिता धनपत, जाति ब्राम्हण के नाम से उनका दाखिला हुआ था। उनकी जन्मतिथि ११ सितम्बर १९२४ दर्ज है। यहां उन्होंने कक्षा चौथी तक अध्ययन किया था। वे अपने गृहग्राम दिघोरी से प्रतिदिन शाला पैदल अपने सहपाठियों के संग मुंगवानी आते थे।
पुराने साथी, शिक्षकों को किया याद -
अपने विद्यार्थी जीवन को याद कर शंकराचार्य महाराज ने पुरानी साथी दीनदयाल तिवारी, इंद्रनारायण और कई जो दिवंगत हो चुके हैं, उनको याद करते बताया कि दिघोरी से मुंगवानी रोजाना पैदल शिक्षा पाने आते थे, तब मार्ग कच्चा और दुविधा थीं। शिक्षार्थी और शिक्षक दोनों समर्पित होते थे। तब और अब की शिक्षा का उन्होंने अंतर भी समझाया। कहा कि शिक्षा अब नौकरी पाने का आधार बनकर रह गई है, शिक्षा के मायने बदल गए हैं। महाराज ने तत्कालीन शिक्षा का उद्देश्य छात्र पढ़-लिख कर मां बाप की सेवा और शिष्टाचार युक्तजीवन बनाना, ईमानदारी, परोपकार के साथ देश समाज की सेवा करने को बतलाया न सिर्फ पढऩे वाले बल्कि पढ़ाने वाले भी बदल गए हैं। महाराज ने कक्षा दसवीं के प्रथम, द्वितीय, तृतीय स्थान वाले विद्यार्थियों को पुरस्कार एवं आशीर्वाद दिया।
कार्यक्रम में अंतराम बघेल, शिव कुमार सोनी, महेंद्र कुमार दुबे, सहेंद्र कुमार राय, यजुवेंद्र किशोर बघेल, राधेश्याम दुबे, राकेश दुबे, सुधा सिसोदिया, प्रीता कंगाले, बीआरसीसी राहुल सिंह, जन शिक्षक गजेंद्र सिंह बघेल, कपिल सिंह बघेल, नीलम सिंह पटेल, नागरिक अजीत सिंह ठाकुर, योगेश जैन, गोलू जैन, राधेश्याम यादव, सरपंच तेज लाल सनोडिया, अनिल उपाध्याय, अरुण उपाध्याय, प्रमिल उपाध्याय, यदुनंदन सनोडिया, शिव कुमार सनोडिया, कपिल शर्मा, मनीष शर्मा, सुभाष बघेल, विकास जैन एवं अन्य उपस्थित रहे।

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