मशरूम उत्पादन तकनीक पर प्रशिक्षण कार्यक्रम सम्पन्न

मशरूम उत्पादन तकनीक पर प्रशिक्षण कार्यक्रम सम्पन्न
मशरूम उत्पादन तकनीक पर प्रशिक्षण कार्यक्रम सम्पन्न

Santosh Dubey | Updated: 12 Oct 2019, 12:38:34 PM (IST) Seoni, Seoni, Madhya Pradesh, India

कृषि विज्ञान केंद्र के दर्पण सभागार में हुआ कार्यक्रम

सिवनी. कृषि विज्ञान केंद्र, सिवनी के दर्पण सभागार में मशरूम उत्पादन तकनीक पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया।
खाद्य विज्ञान विशेषज्ञ जीके राणा द्वारा मशरूम की खेती, उत्पादन तकनीक तथा प्रसंस्करण पर विस्तारपूर्वक जानकारी प्रदाय करते हुए बताया गया कि मशरूम को उगाने के लिए आवश्यक तत्व सामग्री बाविस्टीन, फार्मोलिन, भूसा, बैड्स से चरणबद्ध तरीके से उपचारीत कर उसमें स्पान (मशरूम का बीज) डालकर उगाई जाती है। मशरूम का महत्व इसलिए है क्योंकि यह कृषि से प्राप्त फसल अवशेषों पर उगाई जाती है जो कि अधिकतर किसान भाई एवं बहन जला देते है। जिससे हानि होती है। इन्हीं अवशेषों को पोषण तथा धनोपार्जन का माध्यम बनाकर मशरूम की खेती से कृषक अपनी आय में वृद्धि तथा अपने भोजन को स्वादिष्ट तथा संतुलित बना सकते है। मशरूम में मुख्यत: प्रोटीन, विटामिन, रेशा पाया जाता है इसके कार्बोहाईड्रेट तथा बसा काफी कम मात्रा में होने से यह हृदय के रोगियों के लिए भी खाने योग्य है। मशरूम के प्रोटीन की सुपाच्यता लगभग 80 प्रतिशत है जो की अंडे के समतुल्य है। यह दैनिक दिनचर्या में विभिन्न पकवानों में सम्मिलित कर आसानी से खाई जा सकती है।
कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. एनके सिंह द्वारा कृृषि के आयामों तथा उनके बारे में विस्तृत जानकारी दी गई एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डांॅ. एपी भंडारकर द्वारा मशरूम में कीट व्याधी नियंत्रण तथा रखरखाव पर सुझाव उपस्थित प्रशिक्षणार्थियों को साझा किए गए। साथ ही वैज्ञानिक डॉ. केके देशमुख द्वारा मशरूम उत्पादनों एवं शेष भूसे को वेस्ट डिकम्पोजर द्वारा अपघटित कर खाद के रूप में उपयोग कर मृदा की उर्वरा शक्ति में वृद्धि तथा उत्पादन को बढाने के बारे में बताया गया।
नरवाई न जलाकर मृदा, जल, जन, जंगल को सुरक्षित एवं समृद्ध करने के लिए कृषकों तथा बहनों को शपथ दिलाई गई जो हमारे आस-पास जागरुकता का माध्यम बनेगी तथा इससे होने वाले नुकसान जैसे, मृदा उर्वरा शक्ति में कमी, खड़ी फसलों का जल जाना, आवासीय परिसर, जंगल, अभ्यारणों, राष्ट्रीय उद्यानों आदि में आग लगने तथा इससे होने वाली हानि से बचा जा सकेगा।
कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र, सिवनी के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख डॉ. एनके सिंह, वरिष्ठ वैज्ञानिक, एपी भंडारकर, (वरिष्ठ कीट वैज्ञानिक), डॉ. केके देशमुख, (वैज्ञानिक, मृदा विज्ञान), जीके राणा, (कार्यक्रम सहायक, खाद्य विज्ञान) डांॅ. किरन पाल सिंह सैनी, (कार्यक्रम सहायक, पशुपालन), जनेकृविवि जबलपुर की रावे छात्रायें एवं देवीप्रसाद तिवारी, नीत लाहौरी, जयशंकर गौतम, पवन गढेवाल एवं हिमांशु कुमारे आदि मौजूद थीं।

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