महीनों से चल रहा क्रमिक अनशन, आदिवासी किसानों को नहीं मिल रहा न्याय

महीनों  से चल रहा क्रमिक अनशन, आदिवासी किसानों को नहीं मिल रहा न्याय

Shiv Mangal Singh | Publish: Sep, 06 2018 08:33:52 PM (IST) Shahdol, Madhya Pradesh, India

जमीन के बदले नहीं मिली नौकरी, न्याय संगत मुआवजा भी नहीं मिला


महीनों से चल रहा क्रमिक अनशन, आदिवासी किसानों को नहीं मिल रहा न्याय

शहडोल/अमलाई. कोयलांचल क्षेत्र के आदिवासी किसानो की जमीन कालरी प्रबंधन छारा वर्षो पूर्व शारदा हाईवाल परियोजना के नाम पर अधिग्रहित कर ली गई। लेकिन आठ साल बीत जाने के बाद भी न तो किसी को नौकरी मिली और न ही न्याय संगत मुआवजा। जिसके लिए किसान ३० जुलाई से क्रमिक अनशन पर बैठे है। जिसकी कोई सुनवाई नहीं हो रही है।
किसानों ने बताया कि कोयलांचल क्षेत्र ग्राम बकही के सैकड़ों किसानों की जमीन को एसईसीएल भूमि अर्जन प्रक्रिया के तहत ३ फरवरी 2010 को 329 एकड़ भूमि विकास अधिनियम के अंतर्गत शारदा हाईवाल परियोजना में अधिग्रहित कर लिया । जिसका भारतीय स्टाम अधिनियम के तहत मुआवजा दिया जाना था । लेकिन किसानों का आरोप है कि मनमाना एवं कम मुआवजा प्रबंधन द्वारा दिया गया है। जबकि नियमत: बैठक कर आपत्ति दावा सुना जाना चाहिए। लेकिन प्रबंधन अपनी तानाशाही एवं फर्जी किसानों की मिलीभगत पर एवार्ड पारित कर लिया गया। जिससे आज भी सैकडों किसान एक ओर नौकरी से वंचित हैं, वहीं मुबावजे की राशि के लिये दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं।
किसानों का आरोप है कि कोल इण्डिया पुर्नवास अधिनियम 2012 में भूमि अर्जन का मुआवजा भूमि अर्जन के दिनांक से किया जाना चाहिए। जिसमें यह नियम है कि राज्य शासन बाजार दर का 3 गुना एवं 100 प्रतिशत सोलिसियम जोड़कर दिया जायेगा। लेकिन ऐसा नहीं किया गया ,बल्कि राज्य शासन द्वारा बाजारू दर प्रदाय किया गया। भारत सरकार कोयला मंत्रालय का भी नियम है कि कुल स्वीकृति जमीन पर एक मुश्त रोजगार दिया जाना चाहिये न कि टुकड़े के भाग में। उक्त नियम 2014 से लागू भी है । यह नियम इसके 5 पांच साल पूर्व भी अधिग्रहित की गई जमीनों पर लागू किया जाना चाहिये जो कि नहीं किया गया है।
इस संबंध में लगातार इस क्षेत्र के दलित आदिवासी किसान भारत सरकार एवं मप्र सरकार के साथ जिला प्रशासन को लगातार पत्र के माध्यम से न्याय की मांग कर रहे हैं लेकिन न्याय न मिलने से इन किसानों में निराशा के भाव है। इस संबंध में किसान लगातार 30 जुलाई 2018 से क्रमिक अनशन पर बैठे हुये हैं। महीनों गुजर जाने के बाद भी ऐसा लगता है कि जिला प्रशासन एवं कालरी प्रबंधन की सारी मानवता मर चुकी है। इस भीसण बरसात में कोई भी इन आदिवासी किसानों का दर्द सुनने वाला नहीं हैं।

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