संस्कार की पाठशाला होते है दादा-दादी

संस्कार की पाठशाला होते है दादा-दादी

shivmangal singh | Publish: Sep, 10 2018 08:18:22 PM (IST) Shahdol, Madhya Pradesh, India

इनसे मिलती है जीवन जीने की बेहतर कला

शहडोल. जहां एक ओर नाती-पोतों के लिए दादा-दादियों के पास समय-समय ही रहता है, वहीं दूसरी ओर आज की पीढ़ी के पास दादा-दादी के लिए समय ही नहीं रहता है। या फिर बामुश्किल से समय निकालते है। जबकि जो नाती पोते अपने दादा-दादी के पास ज्यादा समय गुजारते हैं, तो उन्हे जीवन जीने की बेहतर शिक्षा तो मिलती ही है। साथ ही दादा-दादी का स्नेह और आशिर्वाद भी मिलता है। जिससे फलीभूत होकर लोग जीवन की उचाईयोंं तक पहुंच जाते हैं। इसमें कोई शक नहीं है कि विद्यालय से बेहतर दादा-दादी की पाठशाला होती है, जहां लोगों को जीवन जीने के बेहतर अनुभव और बुजुर्गों का संरक्षण मिलता है। जीवन में यदि कोई भरोसेमंद साथी होता है तो वह दादा-दादी ही होते हैं। आज ग्रांड दिवस पर हम आपको कुछ ऐसे दादा-दादियोंं से परिचित करा रहे हैं। जिन्होने अपने स्नेह और आशिर्वाद से पोते-पोतियों की किस्मत बदल दिया है और जीवन में हर कठिन परिस्थितों से जूझने का गुर बता रहे हैं। साथ ही पोते-पोतियों से दूर रहने वाले दादा दादियों ने भी अपने अनुभव बताए है।
पेंशन से पाल रही पोते-पोतियों को
नगर के मीट मार्केट के पास निवासरत 70 वर्षीय दादी मीना विश्वकर्मा अपने पति की पेंशन से चार पोते और तीन पोतियों को पालकर अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निर्वहन कर रही है। उन्होने पोती शालिनी का ब्याह भी करा दिया है और तीन पोतों को निजी स्कूल में बेहतर शिक्षा दिला रही है। इनका सारा समय अपने पोते-पोतियों के बीच ही गुजरता है।
तरक्की का सिखा रहे गुर
नगर के प्रमुख व्यवसाई बृजेन्द्र गुप्ता अपने तीन नन्हे पोते क्रमश: आर्यन, अयान और अध्याय को जहां एक ओर व्यवसाय के बेहतर गुरों को बताते रहते है। वहीं दूसरी ओर जीवन की हर कठिन परिस्थितियों का डंटकर मुकाबला करने की शिक्षा देते हैं। दादा की इस सीख से छोटा पोता अध्याय गुप्ता शास्त्रीय नृत्य में पारंगत हासिल कर रहा है।
बेटे नहीं पर पोते आते है मिलनेे
वृद्धाश्रम में पिछले दो माह से रह रहे 85 वर्षीय सुन्दर लाल गुप्ता ने बताया कि उनसे उनके बेटे तो मिलने नहीं आते पर उनके दो पोते उनसे मिलने आते रहतें है और साथ में घूमाने भी ले जाते हैं।
उज्जवल भविष्य की करते हैं कामना
वृद्धाश्रम में छह वर्षों रह रहे 82 वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षक रामदास पाण्डेय ने बताया कि उनके सात पोते-पोतियां है, जो उनसे मिलने कभी नहीं आते, मगर वह उनके उज्जवल भविष्य की हमेशा कामना करते हैं ।
पोतों से मिलने जाता हूं
वृद्धाश्रम मेें दस साल से रह रहे 76 वर्षीय बीर सिंह परिहार ने बताया है कि वह अपने दो पोतों से मिलने के लिए दो-चार महीनों में उनके घर अवश्य जाते हैं, क्योंकि उनके साथ रहने का हमेशा मन करता है।
फोन से लेते है हालचाल
वृद्धाश्रम में छह साल से रह रही 80 वर्षीय रामबाई ने बताया कि उनके पोते अनिल कुमार और छोटू अक्सर मोबाइल से उनका हालचाल पूंछते रहते हैं और फोन पर पोतों से बात करने में काफी अच्छा लगता है।

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