पहले भगवान गणेश मूर्ति की हुई थी पूजा, फिर कल्चुरी काल में विराट मंदिर में हुई थी शिव की स्थापना

बाणगंगा में दक्षिणमुखी दामवर्ती और बुढ़ार चौक में स्थित है सिद्ध विनायक की प्रतिमा

By: amaresh singh

Published: 11 Sep 2021, 11:26 AM IST

शहडोल. देवों में विघ्नहर्ता भगवान गणेश को प्रथम पूज्य माना गया है। आराधना के बिना कोई भी शुभ कार्य प्रारंभ नहीं होते। गणपति घर-घर विराज गए हैं। 10 दिनों तक नगर के साथ ही ग्रामीण अंचलों में सिद्ध विनायक की पूजा अर्चना का दौर चलेगा। जगह-जगह पण्डाल सजेंगे और घरों में भी गणपति की प्रतिमाएं स्थापित की जाएगी। ऐसी मान्यता है कि भगवान गणपति के आने के साथ ही सारे विघ्न और विकारों का नाश होता और सुख-समृद्धि का आगमन होता है। नगर में सुख समृद्धि के दाता भगवान गणेश की ऐतिहासिक प्रतिमाएं स्थापित हंै। यह प्रतिमा अलग-अलग मुद्रा में कई कलाओं से परिपूर्ण है। गणेश चतुर्थी पर मंदिरों में स्थापित इन प्रतिमाओं की विशेष पूजा अर्चना होती है। पूरे 10 दिनों तक यहां पर दूर-दराज से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं और कई धार्मिक अनुष्ठान होते हैं।

दक्षिणमुखी और दामावर्ती गणेश
नगर के बाणगंगा मेला मैदान के समीप दक्षिणमुखी और दामवर्ती भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के पुजारी विकास मिश्रा की मानें तो प्रतिमा दशकों पुरानी है। बाणगंगा मेला मैदान के समीप स्थित विराट मंदिर में भगवान आशुतोष की स्थापना के पूर्व प्रथम पूज्य भगवान गणपति की मूर्ति स्थापित कर पूजा अर्चना की गई थी। जिसके बाद विराट मंदिर में पूजा अर्चना हुई थी। यहां स्थापित भगवान गणेश सुख व समृद्धि के दाता है। ऐसी मान्यता है कि दामवर्ती गणेश प्रतिमा काफी शुभ व फलदायी हैं।

बैठी हुई मुद्रा में सिद्ध विनायक स्वरूप
ेनगर के बुढ़ार चौक स्थित गणेश मंदिर लगभग दो सौ वर्ष से भी अधिक पुराना है। यहां सच्चे मन से अपनी मुरादे लेकर आने वाला कभी भी खाली हाथ नहीं लौटा। यहां उत्तरमुखी भगवान गणेश बैठे हुए मुद्रा में सिद्धि विनायक स्वरूप है। भगवान गणपति का यह स्वरूप सारे कार्य सिद्ध करने वाला है। जहां गणेश चतुर्थी को लेकर विशेष साज-सज्जा की गई है।

64 योगिनियों के साथ मां काली के साथ नृत्य गणेश
जिला मुख्यालय से लगभग 10 किमी दूर ग्राम सिंहपुर में मां पार्वती के काली स्वरूप के ठीक बगल में भगवान गणेश विराजमान है। भगवान गणेश की यह प्रतिमा मृदंग बजाते हुए 64 योगिनियों के साथ नृत्य मुद्रा में है। भगवान श्री गणेश की नृत्य मुद्रा में अष्टभुजी प्रतिमा विरले ही मिलती है। इनकी पूजा आठ गांव वाले दुर्बा से होती है साथ ही प्रतिमा में द्वादश गणपति का स्वरूप समाहित है। पुरातत्व विशेषज्ञों की माने तो प्रदेश में यह अद्भुत प्रतिमा है जो कि 10 वीं सताब्दी कल्चुरी कालीन है। इस मूर्ति पर तस्करों की भी नजर थी। पूर्व में तस्करों ने मूर्ति को पार कर दिया था। बाद में पुलिस ने तलाश ली थी।

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