पत्रिका पड़ताल : गर्भ में पल रही अगली पीढ़ी का घुट रहा दम, पैदा हो रहे कमजोर और कुपोषित मासूम

गांव में अतिकुपोषण का दंश, घर-घर एनीमिया, 100 फीसदी गर्भवती महिलाएं एनीमिक
- शहर से सटे छाता में स्वास्थ्य सिस्टम की हकीकत, दवाइयां और न ही जांच, पोषण आहार भी नहीं
- एनीमिया के भयावह हालात, 9 ग्राम से ज्यादा नहीं बढ़ता गांव की महिलाओं का हीमोग्लोबिन

By: shubham singh

Published: 29 Mar 2019, 11:06 PM IST


शुभम बघेल @ शहडोल

गांव-गांव बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए भले ही सरकार तमाम प्रयास कर रही हो लेकिन आदिवासी अंचलों में मैदानी हकीकत काफी डरावनी है। जिला मुख्यालय से सटे छाता गांव में पहुंचकर पत्रिका ने लचर स्वास्थ्य सिस्टम की पड़ताल की। १२ सौ की आबादी वाला यह छाता गांव पिछले कई दशकों से एनीमिया और कुपोषण की चपेट में है। घर-घर में एनीमिया रोग का दंश है। ९ ग्राम से ज्यादा यहां महिलाओं का हिमोग्लोबिन पहुंच ही नहीं पाता है। हर बस्ती में अतिकुपोषण की चपेट में मासूम हैं। गांव की आंगनबाड़ी केन्द्रों के दर्ज १०० फीसदी गर्भवती महिलाएं एनीमिया रोग से जूझ रही हैं। दो आंगनबाड़ी केन्द्रों में चार गर्भवती महिलाएं दर्ज हैं, जो गर्भकाल से ही एनीमिया से ग्रसित हैं। इलाज और बड़ी जांच के लिए १५ किमी शहडोल आना पड़ता है। ग्रामीण कहते हैं, गांव के उपस्वास्थ्य केन्द्र में अक्सर ताला लटकता रहता है। डॉक्टरों को ढूंढना पड़ता है। न तो समय पर दवाईयां मिलती हैं और न ही पोषण आहार दिया जाता है। गांव में कई मासूम अतिकुपोषित होकर जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे हैं लेकिन मुख्यालय से लगे होने के बाद भी अफसरों के कान में जूं तक नहीं रेंगी।

पहले एनीमिया ने ली मां की जान, अब मासूम अतिकुपोषित
पत्रिका टीम आंगनबाड़ी केन्द्र क्रमांक दो पहुंची तो यहां मासूम सतीश बैगा के परिजनों से मुलाकात हुई। चार साल के मासूम सतीश की मां पहले ही एनीमिया की चपेट में आने के बाद दम तोड़ दी थी। अब मासूम पिछले कई सालों से अतिकुपोषण का शिकार है। सतीश की दादी सेमबती बताती हैं, चार साल पहले घर में ही प्रसव हुआ था। प्रसव के बाद हालत बिगड़ी और ८ दिन के भीतर ही सतीश की मां की मौत हो गई थी। डॉक्टर कहते थे एनीमिया था। अब अतिकुपोषित सतीश को बचाने के लिए संघर्ष कर रही हैं। सतीश की उम्र ४ साल २ माह है। वजन १० किलो ५ सौ ग्राम था। डॉक्टर्स के अनुसार, इस उम्र में सतीश का वजन १४ किलो होना चाहिए।

9 माह बाद कार्ड, न जांच न दवाई, 28 की जगह सिर्फ तीन पोषण आहार
पत्रिका टीम गर्भवती एनीमिक राधा बैगा पति नमनदास बैगा के घर पहुंची। यहां स्वास्थ्य विभाग की बड़ी लापरवाही सामने आई। ९ माह पूरे होने को हैं, जब कार्ड पहुंचता है। कई महत्वपूर्ण जांच का कॉलम पूरी तरह खाली था। राधा बैगा के अनुसार, न तो निर्धारित पोषण आहार दिया गया और न ही आयरन की दवाईयां दी गई। तीन माह से लेकर नौ माह तक १०० दिन के लिए २०० दवाईयां देनी चाहिए लेकिन राधा बैगा को सिर्फ तीन बार ही दवाईयां दी गई। इसके साथ ही पोषण आहार हर सप्ताह मिलना चाहिए लेकिन ९ माह के अंतराल में सिर्फ दो ही बार पोषण आहार राधा तक पहुंचा है। जबकि ९ माह में २८ पोषण आहार के पैकेट्स पहुंचने चाहिए।

गर्भकाल में मां को एनीमिया, अब अतिकुपोषण से जूझ रही मासूम
बुढ़ार अस्पताल में संचालित एनआरसी सेंटर (पोषण पुनर्वास केन्द्र) में पत्रिका पहुंची तो यहां अतिकुपोषित ३ साल ४ माह की मासूम पूनम सिंह को रखकर इलाज दिया जा रहा था। पूनम पिछले कई सालों से अतिकुपोषण का दंश झेल रही है। पूनम के साथ ही मां चंपा बाई भी एनीमिक है। चंपा बाई का वर्तमान में ९.४ ग्राम एचबी था। गर्भकाल के दौरान भी चंपा बाई एनीमिक रह चुकी है। अब मां और बेटी दोनों को एनआरसी सेंटर में रखा गया है। ३ साल ४ माह में पूनम का वजन सिर्फ ९ किलो ४३० ग्राम है, जबकि इस उम्र में १४ किलो वजन होना चाहिए था।

अस्पताल के लिए सरपंच को लगाने पड़े चक्कर, अब खुला ताला
लडख़ड़ाई स्वास्थ्य सुविधाओं के हालात ऐसे हैं कि यहां उपस्वास्थ्य केन्द्र को बने ७ साल हो गए लेकिन अभी भी बेहतर तरीके से संचालित नहीं हो सका है। बिल्डिंग तैयार होने से लेकर अब तक अस्पताल में ताला लगा रहा। गांव के सरंपच बुद्धे बैगा को काफी संघर्ष करना पड़ा। दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़े। हाल ही में एक सप्ताह पहले उप स्वास्थ्य केन्द्र की चाबी दी गई है।

9 ग्राम से नहीं बढ़ता एचबी, फिर बच्चे होते हैं कुपोषित
पोषण आहार और तमाम योजनाएं यहां तक न पहुंचने से स्थिति ऐसी है कि यहां महिलाओं का हिमोग्लोबिन ९ ग्राम से ज्यादा बढ़ ही नहीं पाता है, जबकि सामान्य महिलाओं का हीमोग्लोबिन ११ ग्राम से कम नहीं होना चाहिए। प्रसव काल के दौरान यहीं महिलाएं एनीमिया के हाईरिस्क जोन में पहुंच जाता है। जिसका सीधा असर गर्भ में पल रहे मासूम पर पड़ता है। मासूम भी कुपोषण की चपेट में आ जाता है। गांव में गर्भवती चार महिलाएं हैं। चारों एनीमिया से ग्रसित हैं। इसके अलावा १२ बच्चे कुपोषण की श्रेणी में हैं।

एक नजर : लचर हेल्थ सिस्टम पर
- आंगनबाड़ी एक में चार बच्चे कुपोषित दर्ज मिले। कार्यकर्ताओं का कहना था इस बार पोषण आहार नहीं आया।
- दो आंगनबाड़ी केन्द्रों में चार गर्भवती महिलाएं दर्ज हैं। चारों महिलाएं एनीमिक हैं।
- आंगनबाड़ी केन्द्रों के अनुसार, महिलाएं और गर्भवती अधिकांश एनीमिक हैं। ९ ग्राम से ज्यादा एचबी नहीं होता।
- आंगनबाड़ी केन्द्र दो में ५० बच्चे दर्ज हैं लेकिन २० ही पहुंचे थे। इसमें ८ बच्चे कुपोषण की चपेट में हैं।
- गर्भवती महिलाओं के यहां पहुंच पड़ताल की तो सामने आया कि न पोषण आहार मिलता है न ही आयरन दवाईयां।

 

इस संबंध में जानकारी अभी ही मेरे संज्ञान में आई है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से बातचीत की जाएगी।
शोभित जैन, कमिश्नर शहडोल

इलाज के लिए शहडोल का सफर
गांव में स्वास्थ्य सुविधाएं न के बराबर है। इलाज के लिए शहडोल जाना पड़ता है। अस्पताल में ताला लगा रहता है। कई साल चक्कर लगाने के बाद अस्पताल का ताला खुला है। गांव में कुपोषण और एनीमिया के कई मरीज हैं लेकिन कभी अधिकारी ध्यान ही नहीं देते हैं।
बुदधे सिंह, सरपंच छाता

shubham singh Incharge
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