अनाथ बच्चों को घर में दिया सहारा, पेरेन्ट्स बन कर रहे पालन-पोषण

नेशनल सिंगल पेरेंट्स डे-बेहतर शिक्षा दिलाकर संवारेंगे अनाथ बच्चों का कॅरियर, पांच साल पहले चार बच्चों के सिर से उठ गया था माता-पिता का साया

शहडोल. आधुनिक आपाधापी भरे जीवन में जहां एक ओर लोगों को अपनों का सहारा नहीं मिलता है। वहीं दूसरी ओर संभागीय मुख्यालय में व्यवसायी रंजीत बसाक ने छह अनाथ बच्चों को न सिर्फ अपने घर में रखकर सहारा दिया है, बल्कि पालन-पोषण कर उनके अच्छे कॅरियर बनाने का संकल्प भी लिया है। विशाखापटन से शहडोल आए वेन्ड्रा परिवार के चार बच्चों के सिर से जब माता-पिता का साया उठ गया था। तब उनके जीवन में व्यवसायी रंजीत बसाक मसीहा बन कर आए और चारों बच्चों को अपने घर में रखकर पिछले पांच वर्षों से उनके अभिभावक की बखूबी भूमिका निभा रहेे हैं। माता-पिता का साया उठने पर इन बच्चों के समक्ष अपने जीवकोपार्जन की समस्या बन गई थी और दुकानों में शोषण का शिकार होकर जीवन की दिशा से भटक रहे थे, मगर अब उन्हे रंजीत बसाक का सहारा मिल गया है और वह अपने बेहतर कॅरियर की तैयारी में जुटे हुए हैं।
हार्ट अटैक से माता तो दुर्घटना से हुई थी पिता की मौत
रंजीत बसाक के घर में रह रहे बच्चे विजय कुमार वेन्ड्रा, अजय कुमार वेन्ड्रा, अक्षय कुमार वेन्ड्रा और लीना वेन्ड्रा ने पत्रिका को बताया कि पांच साल पहले उनकी मां बॉबी वेन्ड्री की हार्ट अटैक से मौत हो गई थी। इसके सात महीने बाद उनके पिता रामबाबू वेन्ड्रा की रेल दुर्घटना में मौत हो गई। इसके बाद व शहर की दुकानों में काम करके अपना भरण पोषण करते थे, मगर अब उन्हे कोई काम नहीं करना पड़ता। विजय की चाहत पुलिस विभाग में अधिकारी, तो अजय रेलवे चालक बनना चाहता है। जबकि अक्षत हवाई जहाज में पॉयलट और लीना टीचर बनना चाहती है।
भलाई का कार्य करने का मंै तो सिर्फ माध्यम हूं
भलाई का कार्य करने के लिए मैं तो सिर्फ एक माध्यम हूं। इस सृष्टि के निर्माता की यदि मेरे माध्यम से दूसरों की भलाई कराने की मंशा है, तो इससे मैं कैसे दूर रह सकता हूं। दूसरों की भलाई करने के लिए मैं हमेशा तत्पर रहता हूं और यह मेरा लक्ष्य बन चुका है। इन बच्चों के बेहतर कॅरियर के लिए मैं हर संभव प्रयास में जुटा हूं।
रंजीत बसाक, व्यवसाई, शहडोल

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brijesh sirmour Reporting
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