परिवार का दबाव था, नौकरी छोडऩे वाली थी, लड़कर बदला फैसला, हजारों मरीजों की दी नई जिंदगी

- डॉक्टर भाई-भाभी संक्रमित, फिर भी ससुराल और परिवार को छोड़ मरीजों की जान बचाने में जुटी
- दिल्ली की अस्पतालों को छोड़ आदिवासी अंचल में कोरोना मरीजों का इलाज कर रहीं डॉ किरण

By: Ramashankar mishra

Published: 02 May 2021, 12:39 PM IST

शहडोल. मेडिकल कॉलेज शहडोल के मेडिसिन विभाग की एचओडी डॉ. किरण टांडिया के समर्पण और सेवाभावना की कहानी किसी प्रेरणा से कम नहीं है। कोरोना संक्रमित मरीजों का इलाज करते हुए परिवार के दो सदस्य कोरोनो पॉजिटिव हो गए। भाई अभी भी संक्रमण से जंग लड़ रह रहे हैं। पांच माह शादी को हुए थे लेकिन सैकड़ों मरीजों की जान पर बात आई तो परिवार को छोड़ वे ड्यूटी का फर्ज निभा रही हैं। मेडिकल कॉलेज के आइसीयू में भर्ती कोरोना मरीजों के इलाज में पिछले 10 माह से जुटी हुई हैं। हर दिन 10 से 12 घंटे मरीजों के इलाज में जुटी हुई हैं। डॉक्टरों की टीम के साथ मिलकर अब तक दो हजार से ज्यादा मरीजों को मेडिकल कॉलेज से स्वस्थ्य करके भेजा है। डॉ किरण बताती हैं, कई बार तो रात भी मरीजों के इलाज में बीत रही है। आइसीयू में हर दिन क्रिटिकल मरीज आ रहे हैं। परिजनों की पीड़ा देखकर कई बार आंख भर आती हैं। एक-एक मरीजों की जिंदगी बचाना हमें सुकून दे जाता है। डॉ. किरण के साथ भाई, भाभी और पति भी मरीजों के इलाज में जुटे हुए हैं।
परिवार का दबाव, छोडऩी थी नौकरी, स्थिति देख बदला फैसला
डॉ किरण कहती हैं, शादी के बाद परिवार का लगातार दबाव था। फरवरी माह में नौकरी छोड़कर दिल्ली ससुराल जाने वाली थी लेकिन अचानक कोरोना संक्रमण के मामले बढऩे लगे थे। मरीजों के इलाज में लगे ही थे कि मौत के आंकड़े भी बढऩे लगे थे। बाद में जाने का फैसला बदल दिया। इसके पति ने भी साथ दिया। वे भी मरीजों के इलाज में हौसला बढ़ाते हैं।
नौकरी नहीं, अपने लोगों के लिए कर रही हूं काम
डॉ किरण कहती हैं, ये नौकरी नहीं, बल्कि अपने लोगों के लिए काम करने का मौका मिला है। दो माह पहले नौकरी छोड़कर ससुराल जाने का निर्णय लिया था लेकिन लगातार मामले बढ़ते जा रहे थे। जिन मरीजों का इलाज कर रहे थे, वे ही अचानक संक्रमण बढऩे से दम तोड़ रहे थे। फिर लगा कि अभी नौकरी छोड़ देती तो कभी सुकून नहीं मिलेगा। बाद में निर्णय बदला और यहीं रुक गई।
रातभर सोचते हैं, अगले दिन क्या करें कि जिंदगी बचा सकें
डॉ किरण और मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों की टीम रात में अस्पताल छोडऩे से पहले प्लानिंग तैयार करते हैं। डॉ किरण के अनुसार, हर रात यहीं सोचते रहते हैं कि कौन मरीज कितना क्रिटिकल है। कैसे मरीज की जान बचा सकते हैं। कई बार तो खाना खाना तक भी भूल जाते हैं।

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