आदिवासी समाज की अजीब परंपरा, मवेशियों के साथ तोड़ते हैं दिनभर का मौनी व्रत

मौन रहकर जंगल में बिताते हैं वक्त, मवेशियों के नीचे से निकलकर और उनके साथ खाना खाकर तोड़ते हैं व्रत..

By: Shailendra Sharma

Published: 15 Nov 2020, 07:11 PM IST

शहडोल. हमारे देश में तरह की तरह की परंपराएं हैं लेकिन शहडोल जिले के आदिवासियों में एक ऐसी परंपरा है जिसके बारे में न तो आपने पहले कभी सुना होगा और न ही कभी ऐसी परंपरा देखी होगी। आदिवासी समुदाय गौड़ और बैगा में इस परंपरा का खास महत्व है। वो इसे मौनी व्रत परंपरा कहते हैं।

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क्या है मौनी व्रत परंपरा ?

मौनी व्रत परंपरा का दिवाली पर विशेष महत्व होता है। हर साल दिवाली पर आदिवासी समुदाय के युवा जिनमें युवतियां भी शामिल होती हैं मौनी व्रत रखते हैं। सुबह युवाओं के जोड़े बनाए जाते हैं जो मवेशियों के साथ दिनभर जंगल में मौन व्रत रखते हैं और जब शाम को घरों पर लौटते हैं तो समुदाय के साथ एक चौरा पर एकत्रित होते हैं। यहां पर विशेष पूजा की जाती है और मौन व्रत रखने वाले युवाओं के साथ ही अन्य लोग भी मवेशियों के नीचे से सात बार निकलते हैं। इतना ही नहीं मवेशियों के नीचे से निकलने के बाद मवेशियों की तरह की खाना भी खाते हैं। मौत व्रत रखने वाले युवाओं को उनके ही मवेशियों के साथ एक ही पत्तल में खाना परोसा जाता है और युवा भी बिना हाथ लगाए मवेशियों की तरह केवल मुंह से भोजन करते हैं। शहडोल शहर से सटे खोलहाड़ गांव में आदिवासी परिवारों के बीच इस साल भी मौनी व्रत का आयोजन किया गया।

 

 

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क्या है मान्यता ?

मौनी व्रत की परंपरा को लेकर आदिवासी बताते हैं कि ये परंपरा गौवंश का आभार जताने और उनका दर्द समझने के लिए निभाई जाती है। बुजुर्ग बताते हैं गौवंश हमें प्रकृति में हर तरह की मदद करता है और आभार जताने के लिए ही वो इस मौनी व्रत को रखते हैं और एक पूरा दिन मवेशियों की तरह गुजारते हैं।

 

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