ऐसे भी अस्पताल हैं मध्यप्रदेश में, एक पलंग पर भर्ती होते हैं दो-दो मरीज

government hospital facility- शाजापुर मुख्यालय पर जिला अस्पताल है, लेकिन ये अस्पताल मरीजों के दर्द को कम नहीं कर पा रहा है।

 

शाजापुर। जिले की 16 लाख की आबादी के उपचार के लिए शाजापुर मुख्यालय पर जिला अस्पताल है, लेकिन ये अस्पताल मरीजों के दर्द को कम नहीं कर पा रहा है। मरीज खुद कहते हैं कि आए तो इलाज कराने हैं, लेकिन इलाज होगा या नहीं कहा नहीं जा सकता। न डॉक्टर हैं, न मशीनें। अस्पताल में पलंग भी इतने कम हैं कि एक बैड पर दो-दो मरीजों को भर्ती कर दिया जाता है। इसके अलावा स्टाफ की भी कमी इतनी कि हाथ-पैर जोड़ने के बाद ही वे अपनी ड्यूटी पर आते हैं।

पूरा मामला सरकार की खामियों पर अटक जाता है, जो अस्पतालों में न तो स्टाफ की पूर्ति कर पाती है और न ही आवश्यक मशीनों की। ऐसे में मरीजों को परेशानी झेलना पड़ती है। गर्भवती महिलाओं को कई दिनों तक लाइन में लगकर सोनोग्राफी कराना पड़ती है। प्रसव के समय रैफर कर दिया जाता है और रास्ते में ही प्रसव हो जाता है। एक्सरे के हाल और भी खराब हैं, मरीजों को कागजों पर एक्स-रे निकाला जाता है, एक्स-रे फिल्म दो साल से नहीं आई है। खामियों की लंबी फहरिस्त है, लेकिन सवाल उठता है कि इन खामियों को दूर कौन करेगा।

 

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प्रमुख समस्याएं
-स्टाफ की कमी है, इस कारण मान-मनौव्वल करके इमरजेंसी ड्यूटी करवाई जाती है।
-दो साल से कागज पर निकाले जा रहे एक्स-रे।
-जरूरी मशीनों का अभाव, मांग पत्र भेजा, कोई असर नहीं।
-सोनोग्राफी के लिए लंबी लाइन, चार-पांच दिन की वेटिंग।
-अस्पताल परिसर में पार्किंग की व्यवस्था भी नहीं।
-आए दिन गर्भवती महिलाओं को रैफर कर दिया जाता है, जिसके बाद रास्ते में ही डिलेवरी हो जाती है।
-दो साल से अधूरा पड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर का काम।
-10 करोड़ से बनी ट्रामा सेंटर का संचालन शुरू ही नहीं हुआ।

 

डॉक्टरों का अभाव है
शाजापुर के सीएमएचओ प्रकाश विष्णु फूलंबीकर कहते हैं कि आवश्यक मशीनों, मानव संसाधनों, डाक्टरों का अभाव है। लगातार शासन को अवगत कराया गया है। गंभीर स्थिति में रैफर करना पड़ता है, जो चिकित्सक और संसाधन हैं, उसी से मरीजों का उपचार किया जाता है। व्यवस्था न बिगड़े इसके प्रयास हमेशा रहता है।

Manish Gite
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