चतुर्भुज नाथ  के दरबार में 28 साल से चल रहा है कीर्तन, 500 साल से जल रही है अखंड ज्योति

दो राज्यों के बीच आस्था का सेतु बना रामेश्वर त्रिवेणी संगम स्थिति चतुर्भुज मंदिर

By: rishi jaiswal

Published: 29 Nov 2020, 11:20 PM IST

श्योपुर. मध्यप्रदेश और राजस्थान की सीमा पर स्थित यूं तो पवित्र त्रिवेणी संगम रामेश्वर एक बड़ा तीर्थ स्थल है, लेकिन यहां दोनों ओर बने पौराणिक मंदिरों पर दर्शनों के बिना ये तीर्थ पूरा नहीं होता है। त्रिवेणी के राजस्थान वाले हिस्से में स्थित भगवान चतुर्भुज नाथ का मंदिर तो दोनों राज्यों के बीच आस्था और आध्यात्म का सेतु बना हुआ है। जहां 500 सालों से अखंड ज्योति जल रही है, वहीं मंदिर में 28 साल से अखंड कीर्तन चल रहा है, जिसमें मध्यप्रदेश और राजस्थान के आधा सैकड़ा से अधिक गांवों के लोगों की बारी-बारी ड्यूटी लगती है।


रामेश्वर त्रिवेणी संगम पर स्थित चतुर्भुज नाथ मंदिर की स्थापना के संबंध में कोई स्पष्ट लेख तो नहीं है, लेकिन मान्यता है कि मंदिर की स्थापना दो हजार साल पूर्व हुई थी। शुरुआत में मंदिर परशुराम घाट किनारे ही था, लेकिन बाद में श्रद्धालुओं ने लगभग 250 मीटर दूर एक भव्य मंदिर बनाकर वहां चतुर्भुज नाथ की प्रतिमा स्थापित की। इसके साथ ही बीते 500 साल पूर्व ज्योति जलाई गई, यही वजह है कि यहां जो भी श्रद्धालु जाते हैं, वो अपनी क्षमतानुसार घी ले जाते हैं, जिससे अखंड ज्योति निरंतर जल रही है। विशेष बात यह है कि मंदिर में पूजा अर्चना का काम श्योपुर निवासी एक ब्राह्मण परिवार द्वारा कई पीढिय़ों से किया जा रहा है। इसके साथ ही संत कृष्णानंद महाराज के अनुयायियों ने चतुर्भुज नाथ मंदिर पर 1 मार्च 1992 से अखंड कीर्तन शुरू किया, जो आज भी निरंतर जारी है। वर्तमान में यहां आधा सैकड़ा गांवों के लोगों की ड्यूटी दिन के हिसाब से लगी हुई है, जिसमें श्योपुर के भी दो दर्जन गांव शालि हैं। यही वजह है कि मंदिर परिसर में हरे रामा, हरे कृष्णा, कृष्णा कृष्णा हरे हरे..., जैसे कीर्तन की अखंड धुनि निरंतर गूंज रही है।

श्योपुर की सीमा में लक्ष्मीनारायण मंदिर अद्वितीय
उस पार जहां चतुर्भुज नाथ मंदिर, कालभैरव मंदिर और गंगाजी के मंदिर हैं, वहीं श्येापुर की सीमा में भगवान लक्ष्मीनारायण का मंदिर है। इसके साथ ही रामेश्वर मंदिर और हनुमानजी के मंदिर इस त्रिवेणी संगम को आस्था का अद्वितीय केंद्र बनाते हैं। मान्यता है कि रामेश्वर वो तपोभूमि है, जहां भगवान परशुराम ने भी तपस्या की थी। बताया जाता है कि मातृ हत्या के संताप को लेकर उन्होंने यहां छह माह तपस्या की थी।


2100 वर्ष पूर्व का रामतीर्थ
जिला पुरातत्व एवं पर्यटन परिषद के नोडल अधिकारी रूपेश उपाध्याय के मुताबिक श्योपुर का रामेश्वर त्रिवेणी संगम ईशा पूर्व पहली शताब्दी से भी पहले का राम तीर्थ है। विक्रम स्मृति ग्रंथ एवं जयचंद्र विद्यालंकार द्वारा भारतीय इतिहास की रूपरेखा में इसका विवरण दिया है। इसके साथ ही इतिहासकार एवं पुरातत्ववेत्ता स्व. डॉ हरिहर निवास द्विवेदी ने मध्यभारत का इतिहास में हिन्दू संस्कृति- निर्माण शीर्षक अंतर्गत इसका विस्तृत विवरण दिया है।

rishi jaiswal
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned