कोख में घुट रहा शिशुओं का दम

तीन साल में शिशु मृत्यु के 547 मामले
- प्रवस के दौरान तीन साल में 1516 शिशु व 51 गर्भवती की मौत
- समय से ट्रैस नहीं हो रही समस्या, स्वास्थ्य विभाग के हेल्थ बुलेटिन के आंकड़े बता रहे हकीकत

श्योपुर
लाख कोशिशों के बावजूद गर्भ में पल रहे शिशु की समस्याएं ट्रैस नहीं हो पा रही है। जिसके चलते गर्भाशय में होने वाली नवजात की मौतों पर लगाम नहीं लग पा रही है। पिछले तीन साल में श्योपुर जिले में 547 स्टिल बर्थ के मामले सामने आए हैं। यानि कोख में ही दम घुट गया। वहीं प्रसव के दौरान गर्भवती और शिशु मृत्यु के आंकड़े भी कम नहीं है। तीन साल में जहां 1516 शिशुओं की मौत हुई है वहीं 51 गर्भवती महिलाओं ने भी दम तोड़ा है। यह हकीकत स्वास्थ्य विभाग के हेल्थ बुलेटिन से सामने आई है।

इस रिपोर्ट में वर्ष 2016-17 में 177, वर्ष 2017-18 में 180 और वर्ष 2018-19 में 190 मौत गर्भ में बताई गई हैं। यह स्थिति तब है जब जननी सुरक्षा योजना पर सरकार हर साल करोड़ों से अधिक की धनराशि खर्च कर रही हैं। गर्भ धारण के तीन महीने बाद से गर्भवती के हाईरिस्क चिहांकन, पांच प्रकार की अनिवार्य जांच हीमोग्लोबिन, डायबिटीज, खून, मलेरिया और सोनोग्राफी के दावे स्वास्थ्य विभाग द्वारा किए जाते हैं लेकिन यह रिपोर्ट बताती है कि गर्भवती की तीसरे महीने से नौवे महीने के बीच सोनोग्राफी सहित अन्य जांचों में लापरवाही बरती जा रही है।
हर साल बढ़ा शिशु मौत का ग्राफ
प्रसव के दौरान हर साल शिशु मौत का ग्राफ बढ़ा है। वर्ष 2016-17 में 400, वर्ष 2017-18 में 460 और वर्ष 2018-19 में 656 शिशुओं ने दम तोड़ा। इस आंकड़ों से पता चलता है कि विभाग शिशु मृत्युदर कम करने में नाकाम रहा है। हालांकि विभाग के अफसरों का दावा है कि तुलनात्मक मौत के आंकड़े से जिले में काफी कम रेशो शिशु मृत्यु का रहा है। लगातार इसमें कमी आ रही है।
बढ़ता मौत का ग्राफ
मातृ-मृत्यु दर का ग्राफ स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के बाद भी बढ़ता जा रहा है। संचालनालय स्वास्थ्य सेवा की सालाना रिपोर्ट ही हकीकत उजागर कर रही है। वर्ष 2016-17 में 19 गर्भवती की मौत दर्ज की गई वहीं वर्ष 2017-18 में 12 और वर्ष 2018-19 में 20 मौत दर्ज की गईं। दरअसल संचालनालय स्वास्थ्य सेवा द्वारा गर्भवती की मौत के बाद डेथ आडिट के निर्देश दिए गए हैं। जिससे मौत के कारणों का पता लगाया जा सके और चिकित्सीय सेवाओं में खामियां दूर की जा सके। लेकिन निर्देशों के विपरीत जिम्मेदार डेथ आडिट के नाम खानापूर्ति में जुटे हैं।
सोनोग्राफी जांच पर प्रश्नचिंह
स्त्री रोग विशेषज्ञों का कहना है कि ज्यादातर गर्भवती प्राईवेट सेंटरों में सोनोग्राफी करा रही हैं। बहुत कम सेंटरों में ही प्रशिक्षित रेडियोलॉजिस्ट हैं। अप्रशिक्षित लोग सोनोग्राफी में गर्भ में पल रहे शिशु की स्थिति ट्रैस नहीं कर पा रहे हैं और गलत रिपोर्ट दे रहे हैं। दूसरी बात ये है कि ग्रामीण क्षेत्रों में गर्भवती की नौवे महीने तक जांच ही नहीं हो रही हैं। जिसके चलते सातवें से नौवे महीने के बीच कोख में शिशु की स्थिति बिगड़ रही है।
ये भी हैं कारण
- ग्रामीण क्षेत्र के प्रसव केंद्र में ऑपरेशन थियेटर और बेहोशी के डॉक्टर नहीं है जिससे इमरजेंसी में प्रसव नहीं हो पाता है। रेफर करने पर जिला अस्पताल आते-आते केस गंभीर हो जाता है।
- ग्रामीण क्षेत्रों के प्रसव केंद्रो में स्त्री रोग विशेषज्ञों की भारी कमी है। प्रसव पूर्व पांच घंटे महत्वपूर्ण होते हैं। इस दौरान केयर नहीं होने से केस बिगड़ रहे हैं।
- तीसरा कारण खून की कमी, हार्ट और किडनी की बीमारी है। ये बीमारियां गर्भवती को हैं तो गर्भ में पल रहे शिशु की जान जोखिम में रहती है। ऐसे प्रसव डॉक्टरों की देखरेख में होने चाहिए।
फैक्ट फाइल
स्टिल बर्थ
वर्ष मौत
2016-17 177
2017-18 180
2018-19 190
मातृ एवं शिशु मृत्यु
वर्ष गर्भवती मौत शिशु मौत
2018-19 20 656
2017-18 12 460
2016-17 19 400

वर्सन
मातृ मृत्युदर व शिशु मृत्युदर के मामलों में कमी आई है। संस्थागत सुरक्षित प्रसव के जरिए प्रसूताओं की मौत को और कैसे कम किया जा सकता है। इस दिशा में तेजी से काम किया जा रहा है।
डॉ.एआर करोरिया
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, श्योपुर

Anoop Bhargava Bureau Incharge
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