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खुशहाली के चमकीले आंकड़ों पर भारी, आदिवासियों के सिर पर लकड़ी का बोझ

- जिले में संचालित तमाम योजनाओं के बाद भी बदहाल जीवन जीने को मजबूर आदिवासी

श्योपुर

Published: January 06, 2022 05:57:21 pm

अनूप भार्गव/श्योपुर
आदिवासी समुदाय की खुशहाली के आंकड़े भले ही चमकीले हों, लेकिन गरीबी की दास्तां उससे कहीं ज्यादा पीड़ा देने वाली है। क्योंकि सरकारी की तमाम योजनाएं आज तक उनके सिर से लकड़ी का बोझ कम नहीं कर सकी हैं। हालांकि गरीबी उन्मूलन के नाम पर सूबे की सरकार आदिवासी विकासखंड में ढेरों योजनाएं चलाकर सरकारी खजाने से खूब पैसा लुटा रही है। केंद्र सरकार से भी आर्थिक मदद मिली है। लेकिन ऐसा लगता है कि सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं से भी आदिवासी समुदाय की गरीबी दूर नहीं हो रही। इसका सबसे बड़ा सबूत आदिवासी समुदाय के सिर पर रखी लकड़ी की ग_र है।
मनरेगा, राष्ट्रीय मातृत्व लाभ योजना, राष्ट्रीय परिवार सहायता, विधवा निशक्त पेंशन, किसानों को पीएम सीएम सम्मान निधि योजना, मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना, शिक्षा गारंटी योजना, प्रधानमंत्री अन्ना योजना, रियायती अनाज जैसी योजना के बाद भी ग्रामीण इलाको में बुनियादी सुविधाओं के लिए ग्रामीण संघर्ष कर रहे हैं। इतना ही नहीं महिलाओं को पोषण राशि तक नहीं मिल पा रही है। इसके लिए उनको दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। जबकि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ सर्वेक्षण (एनएफएचएस) की रिपोर्ट तीन मानक आधार पर तैयार की है। एमपीआइ के तीन मानको में स्वास्थ शिक्षा और जीवनस्तर को शामिल किया गया है। इसमें पोषण बाल एवं किशोर मृत्यु दर, प्रसव पूर्व देखभाल स्कूल शिक्षा के वर्ष स्कूल में उपस्थिति खाना पकाने का ईधन स्वच्छता पेयजल बिजली आवास संपत्ति और बैंक खाते को शामिल किया गया है।
खुशहाली के चमकीले आंकड़ों पर भारी, आदिवासियों के सिर पर लकड़ी का बोझ
खुशहाली के चमकीले आंकड़ों पर भारी, आदिवासियों के सिर पर लकड़ी का बोझ
बुनियादी सुविधाओं से वंचित आदिवासी समुदाय
आदिवासी ग्रामीण जो कि मूलभूत सुविधाओं से एवं अपने अधिकारों से वंचित हैं, उन्हें अधिकार दिलाने के भरसक प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन उनको योजनाओं का कम ही लाभ मिल पा रहा है। कराहल विकासखंड के गांवों में बच्चे महिलाओं को इतनी ठंड में नंगे पैर जलाऊ लकड़ी सिर पर लाते देखा जा सकता है। मात्र 150 से 200 रुपए की जलाऊ लकड़ी बेचने जंगल से होते हुए कड़कती ठंड में नंगे पैर 50 किमी की दूरी तय कर लकड़ी बेचने आदिवासी महिलाएं आती हैं।
यह है महिलाओं की पीड़ा
30 वर्षीय कलावती से पूछा गया कि वह लकड़ी बेचने क्यों आई है तो उसका कहना था कि गांव में काम नहीं मिलता तो जंगल से लकड़ी बीनकर इनको बेचकर कमाए पैसों से पेट भरने के लिए नमक तेल लेकर काम चला लेते है। इस महिला की पीड़ा और उसके परिवार की आर्थिक स्थिति और शासन की आदिवासियों के नाम पर दिए जाने वाली सुविधाओं का अंदाजा लगाया जा सकता है। इसी तरह 17 वर्षीय युवती बताया कि माता-पिता को काम नहीं मिल पाता इसलिए परिवार चलाने के लिए उनके साथ लकड़ी बेचने आना पड़ता है।
फैक्ट फाइल
कराहल क्षेत्र मे जॉबकार्डधारी: 22000
कुल गांव: 585
ग्राम पंचायत: 225
कुल आबादी: करीब 7 लाख
खाद्याान पात्रता परिवार: करीब 1 लाख

प्रभारी सहायक आयुक्त नहीं उठाते फोन
जनजातीय कार्य विभाग जिस पर आदिवासी समुदाय की योजनाओं को अमली जामापहनाने का दायित्व है। उस विभाग के प्रभारी सहायक आयुक्त फोन तक नहीं उठाते। योजनाओं और आदिवासियों को लेकर उनसे सवाल करने के लिए जब उनके मोबाइल नम्बर 9826237583 पर कॉल किया तो उन्होंने फोन नहीं उठाया। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि पीडि़त हितग्राही की समस्या का समाधान कैसे होता होगा।
इनका कहना है
यह बात सही है कि सहरिया को योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। उनको लाभ मिले और बेरोजगार युवाओं को रोजगार इसके लिए मैं प्रयासरत हूं। वहीं अन्य समस्याओं के समाधान के लिए अफसरों से भी कह चुका हूं।
सीताराम आदिवासी
विधायक, विधानसभा क्षेत्र विजयपुर

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