लाखों रुपए की लागत से बने शौचालय बने कबाड़ घर

- स्नानघर और कबाड़ रखने के लिए ग्रामीण कर रहे उपयोग
- स्वच्छ भारत अभियान को लग रहा पलीता, अधिकारी भी नहीं ले रहे सुध

By: Anoop Bhargava

Published: 19 Mar 2020, 11:16 AM IST

श्योपुर/कराहल
भले ही लाखों रुपए की लागत से ग्राम पंचायतों में शौचालय निर्मित कराकर कागजों में उन्हें खुले में शौच मुक्त कर दिए हैं, लेकिन हालात ये हैं कि ये शौचालय गांवों में शोपीस अथवा कबाड़ा घर बनकर रह गए हैं। ग्रामीणों की मानें तो कहीं शौचालयों का अधूरा निर्माण हुआ है, तो कही निर्माण सही हुआ है वहीं पानी की समस्या के चलते ग्रामीण शौच करना मुनासिब नहीं समझते हैं। इसके चलते गांवों में शासन द्वारा बनवाए शौचालय कही शो-पीस बने हुए हैं तो कही ग्रामीणों ने शौचालयों का अपने घरेलू सामान रखने के अलावा अन्य कार्यों में उपयोग कर लिया है। विकासखंड कराहल की कई ग्राम पंचायतों में अधिकांश शौचालयों का ही उपयोग नहीं हो पा रहा है।

कराहल क्षेत्र में बनाए गए शौचालयों में से करीब एक चौथाई शौचालयों में कबाड़ भरा है। कई शौचालयों में ताला लगा हुआ है। कई शौचालय बदहाल स्थिति में है। किसी सक्षम अधिकारी द्वारा इन शौचालयों की जांच ना किए जाने के कारण लाभार्थी द्वारा उनका प्रयोग नहीं किया जा रहा। आज उन शौचालयों का प्रयोग सामान रखने के लिए किया जा रहा है। पंचायत के जिम्मेदारों की मिलीभगत से गड़बड़ी की शिकायतें गांवों में मिल रही हैं। प्रधानमंत्री द्वारा महात्मा गांधी के सपने को साकार करने के लिए पूरे देश में एक साथ स्वच्छ भारत मिशन चलाकर घर-घर शौचालय का निर्माण कराया गया था, लेकिन बड़ी संख्या में शौचालय ऐसे हैं जिनका आज तक प्रयोग नहीं किया गया, जिसके चलते ग्रामीण अभी भी खुले में शौच के लिए जा रहे हैं।

सीट पर पटिया रखकर बनाया सामन रखने का घर
आदिवासी बाहुल्य गांव सहित अन्य ग्रामीणों द्वारा अधिकांश शौचालयों का उपयोग नहीं किया जा रहा है। इतना ही नहीं कई आदिवासियों ने तो अपने शौचालयों की सीट पर पत्थर रखकर सीट को बंद कर दिया है और शौचालय का घरेलू सामान रखने के अलावा पानी रखने का घर बना लिया है। इसके अलावा कही शौचालयों में सीट नहीं है तो किसी का गड्ढा खुला पड़ा हुआ है। इतना ही नहीं यदि शौचालय सही निर्मित हैं तो वहां पर पानी की व्यवस्था नहीं होने के कारण शौचालय अनुपयोगी बने हुए हैं।

कागजों तक सिमटकर रह गया स्वच्छता अभियान
कराहल जनपद पंचायत की कई ग्राम पंचायतों में स्वच्छता अभियान का भी पूरी तरह से पालन नहीं हो पा रहा है। ग्रामीणों के मुताबिक शौचालय का सही उपयोग न होकर वे शौचालय शो-पीस बने हुए हैं और ग्रामीण खुले में शौच के लिए जा रहे हैं। इसके चलते स्वच्छ भारत अभियान कागजों तक सीमित रह गया है।

पानी की किल्लत बनी अहम वजह
ग्रामीणों की मानें तो 10 फीसदी शौचालय तो अधूरे बने हुए हैं। इसमें गड्ढे नहीं है या शौचालय के पाइप का गड्ढों तक कनेक्शन नहीं है। इसके अलावा 5 फीसदी ग्रामीण अशिक्षित या रूढि़वादी के चलते घर के पास शौच करना मुनासिब नहीं समझते हैं। इसके अलावा 30 फीसदी शौचालय पानी की समस्या के चलते उपयोग नहीं हो पा रहे हैं। इतना ही नहीं शौचालय बनने के बाद आदिवासी सहित अन्य लोगों ने शौचालय की सीट हटाकर उसे स्नानघर के रूप में उपयोग करना शुरू कर दिया है। वहीं ग्राम पंचायतों के सरपंच व सचिव यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं कि समझाइश के बाद भी आदिवासियों में सुधार नहीं हो रहा है।

(वर्जन)
यह बात सही है कि पंचायतों में इस तरह की शिकायतें हैं। कलेक्टर और जिला पंचायत सीईओ के निर्देश हैं कि पंचायतों में ग्रामीणों के सहयोग से सुधार के कार्यक्रम चलाए जाएं। शौचालयों के उपयोग के लिए जागरूकता अभियान जल्द चलाया जाएगा।
एसएस भटनागर
सीईओ कराहल

Anoop Bhargava
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