विलुप्त होती जा रही है श्योपुर जिले में मांडणा कला

पाश्चात्य संस्कृति और आधुनिकीकरण के दौर में अब दीपावली के त्योहार पर भी आधुनिकता का रंग चढ़ रहा है। यही वजह है कि राजस्थानी संस्कृति में रचे-बसे श्योपुर जिले में ग्रामीण लोककला की शान रही मांडणा कला (मांडना) अब धीरे-धीरे अपनी पहचान खोती जा रही है।

By: rishi jaiswal

Published: 17 Nov 2020, 10:47 PM IST

श्योपुर. पाश्चात्य संस्कृति और आधुनिकीकरण के दौर में अब दीपावली के त्योहार पर भी आधुनिकता का रंग चढ़ रहा है। यही वजह है कि राजस्थानी संस्कृति में रचे-बसे श्योपुर जिले में ग्रामीण लोककला की शान रही मांडणा कला (मांडना) अब धीरे-धीरे अपनी पहचान खोती जा रही है। जिसके चलते एक दशक पूर्व तक दीपावली और अन्य तीज त्योहारों के साथ मंगल कार्यों के मौके पर घरों को सजाने-संवारने में सबसे आगे रहने वाली मांडणा कला बीते जमाने की बात हो गई है।


हालांकि जिले के ग्रामीण क्षेत्र में इक्का-दुक्का स्थानों पर मांडणे बने हुए दिख जाते हैं, लेकिन शहरी क्षेत्र से यह कला लगभग गायब हो गई है। घरों को सजाने के लिए एक दशक पूर्व तक जो मांडणे मांडे जाते थे, उनमें छह फूल्या, पगल्या जैसे मांडने शामिल रहा करते थे। इन कलाकृतियों की खास बात ये होती थी कि इन्हें कितने ही बड़े और छोटे साइज में बनाया जा सकता था। मांडणा कला के कलाकार बताते हैं कि इसमें हर सीजन और हर त्योहार के मांडणे रहते हैं। जैसे पगल्या का मांडणा खास तौर पर दीप पर्व के लिए किया जाता है। यूं तो मूलत: ये मांडणा राजस्थान की लोककला है, लेकिन एक दशक पूर्व तक श्योपुर जिले में भी इसका खासा जोर था। इसे विशेष अवसरों पर महिलाएं जमीन अथवा दीवार पर बनाती हैं।


कलाकारों की होती थी पूछ परख
एक दशक पूर्व तक जिले में प्रत्येक तीज त्योहार मांडणा कला के बिना अधूरा माना जाता था। जिलेभर में इसके कलाकारों की खासी पूछ-परख थी। लोग हर तीज त्योहार पर इन कलाकरों को याद कर उनसे अपने घरों की साज-सज्जा करवाया करते थे, लेकिन आज बदलते हुए समय के साथ ही मांडणा कला लगभग बंद सी हो गई है।

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