कायाकल्प की टीम ने किया जिला अस्पताल का निरीक्षण

जिला अस्पताल में शुक्रवार को सभी व्यवस्थाएं चाक-चौबंद कर दी गईं, क्योंकि कायाकल्प की टीम विजिट करने आने वाली थी। अस्पताल प्रबंधन ने पलंग-चादर तो बदल दीं, लेकिन मरीजों को मिलने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं में कोई बदलाव नजर नहीं आया।

By: rishi jaiswal

Published: 05 Feb 2021, 11:33 PM IST

शिवपुरी. जिला अस्पताल में शुक्रवार को सभी व्यवस्थाएं चाक-चौबंद कर दी गईं, क्योंकि कायाकल्प की टीम विजिट करने आने वाली थी। अस्पताल प्रबंधन ने पलंग-चादर तो बदल दीं, लेकिन मरीजों को मिलने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं में कोई बदलाव नजर नहीं आया।
अस्पताल में थोकबंद वार्ड बॉय होने के बावजूद मरीजों के परिजनों को ही स्ट्रेचर खींचना पड़ रहे हैं तथा चलने में असमर्थ मरीजों को स्टे्रचर न मिलने से परिजन कंधे पर टांगकर ले जाते नजर आए। यानि दीवारों व पलंगों को तो साफ-सुथरा कर लिया, लेकिन मरीजों को मिलने वाली सुविधाएं शून्य ही नजर आईं। कायाकल्प का विजिट करने आई तीन सदस्यीय टीम ने हालातों व व्यवस्थाओं का जायजा लेने के साथ ही स्टाफ के लोगों से चर्चा भी की।


शुक्रवार की सुबह से जिला अस्पताल की व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने में पूरा अमला जुटा हुआ था। ट्रॉमा सेंटर की साफ-सफाई व ड्रेसिंग टेबल की शीट आदि बदलने के साथ ही पर्दे भी बदल दिए गए। दोपहर लगभग साढ़े 12 बजे कायाकल्प की राज्य स्तरीय तीन सदस्यीय टीम जिला अस्पताल पहुंची। जिसमें शामिल सदस्यों में अति. संचालक डॉ. उपेंद्र दुबे, डॉ. आदित्य चौरसिया व एक महिला डॉक्टर ने अस्पताल को खंगालना शुरू किया। चूंकि कायाकल्प के तहत अस्पताल की विभिन्न सुविधाओं व व्यवस्थाओं को देखने के बाद टीम के सदस्य नंबर देते हैं। जिसमें साफ-सफाई से लेकर मरीजों को सुविधाएं देने वाले स्टाफ को कितनी जानकारी है, यह भी देखा जाता है। अस्पताल प्रबंधन को टीम के आने की सूचना पहले से ही थी, इसलिए व्यवस्थाओं को सुधार लिया गया था, लेकिन फिर भी कुछ खामियां रह गईं, जिन पर टीम के सदस्यों की नजर पड़ गई।


ड्रेसिंग के डस्टबिन में मिला चाय का कप
डॉ. उपेंद्र दुबे जब ट्रोमा सेंटर का अवलोकन कर रहे थे, तभी उनकी नजर वहां रखे डस्टबिन पर पड़ी तो उसमें चाय का एक डिस्पोजल गिलास पड़ा नजर आया। इस पर उपेंद्र दुबे ने ट्रॉमा प्रभारी से पूछा कि इसमें चाय का कप कैसे फेंका गया?। इस पर वे निरुत्तर हो गए, फिर उन्होंने पूछा कि इस डस्टबिन में क्या फेंका जाना चाहिए?।

प्रबंधन टीम के साथ, मरीज अपने हाल पर
कायाकल्प की टीम की नजर में कुछ कमी न आ जाए, इसके लिए अस्पताल प्रबंधन के जिम्मेदार अलर्ट होकर उनके साथ घूम रहे थे, जबकि इलाज कराने आए मरीज उनके आने का इंतजार कर रहे थे। अस्पताल में पर्याप्त वार्ड बॉय होने के बावजूद मरीज के स्ट्रेचर को उनके ही परिजन धकेलते नजर आए। वहीं चलने में असमर्थ एक महिला मरीज को उसके परिजन कंधे के सहारे डॉक्टर के पास ले जाने की जद्दोजहद करते दिखे।

निरीक्षण में मिलीं कमियां
राज्य स्तरीय कायाकल्प की टीम का नेतृत्व कर रहे डॉ. उपेंद्र दुबे ने चर्चा में बताया कि हमने अस्पताल की व्यवस्थाओं का निरीक्षण किया है, जिसमें कुछ कमियां भी सामने आई हैं। इस निरीक्षण में कई चीजों को देखते हैं और उसके अनुरूप ही नंबर दिए जाते हैं।
जिला अस्पताल को कितने नंबर मिले, यह तो हम भोपाल पहुंचकर ही तय करेंगे। इसमें नंबर-वन आने वाले अस्पताल को 50 लाख रुपए, दूसरे नंबर वाले को 20 तथा तीसरे नंबर पर रहे अस्पताल को 10 लाख रुपए की राशि दी जाती है।

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