आदिवासी लोक कला देख दंग हुए मेहमान

महाउर कला महोत्सव के दूसरे पडा़व में अहिरहाई और चमरौही की प्रस्तुति

By: suresh mishra

Published: 20 Mar 2016, 05:27 AM IST


सीधी। रंगपटल परफॉर्मिंग आर्ट सीधी के आयोजन में 51 दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय महाउर कला महोत्सव के तीसरे दिन 18 मार्च को सीधी के इंद्रवती लोक कला ग्राम रामपुर में अहिरहाई और चमरौही का प्रदर्शन डिपार्टमेंट ऑफ  इंडियन थिएटर चंडीगढ़ पंजाब यूनिवर्सिटी के छात्रों के भ्रमणशील प्रशिक्षण कार्यशाला के अंतर्गत किया।

तीसरे दिन के आयोजन में बघेलखंड क्षेत्र में निवास करने वाली यादव जाति अहिरहाई भी नही बल्कि बघेली क्षेत्र के प्रसिद्ध गाथा गायन परंपराओं का नृत्य रूपों का भी प्रतिनिधित्व करती है। वहीं चमार जाति अपने जातीय नृत्य चमरौही के आलावा बघेली वाद्यों को बनाने का कार्य करती है।

कार्यक्रम के दौरान प्रसिद्ध कला समीक्षक और लेखक संगम पांडेय, पंजाब युनिवर्सिटी के नाट्य विभाग की चेयर परसन डॉ.नवदीप कौर, विश्व विद्यालय की 25 सदस्यी प्रशिक्षणार्थी टीम व सीधी रंगमंच परिवार व महाउर  कला महोत्सव के आयोजन कड़ी के कुंदेर, रोशनी प्रसाद मिश्रा, नरेंद्र बहादुर सिंह सहित राकेश जायसवाल, प्रवीण चौहान, आरती  यादव पुष्पेंद्र वर्मा, रजनीश जायसवाल, करूणा सिंह चौहान, पुष्पेन्द्र मिश्रा, देवेंद्र, पटेल, उपेंद्र कुसराम, धनंजय तिवारी, सुभाष मिश्रा, प्रजीत साकेत आदि उपस्थित थे।

अहिराई और चमरौंही नृत्य प्रदर्शन उपरांत देश के प्रसिद्ध कला समीक्षक व लेखक संगम पांडेय ने नृत्य के प्रदर्शन पक्ष व सौंदर्य पक्ष की सराहना करते हुए कहा की वास्वत में यादव जाति की जीवन शैली श्रम और इनके मानवीय मूल्यों की सजकता की कथा बयां करते हैं। बघेलखंड क्ष़ेत्र अपनी संस्कृति और परंपरा को अत्याधुनिक  समाज के बदलते मानव मूल्यों और परिवेश में भी बचा कर रखा है। यह यहां के आदिवासी समाज और सीधी रंगमच परिवार के सराहनीय प्रयासों  से ही संभव हो पाया है।
suresh mishra
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