script35 newborns did not get the lap of the parents, the administration is | 35 नवजात शिशुओं को फेंका, पर प्रशासन का "पालना" अब भी खाली | Patrika News

35 नवजात शिशुओं को फेंका, पर प्रशासन का "पालना" अब भी खाली

सीकर. अपनों के बिसराए मासूमों को पालने के लिए हम जाग रहे ना जिम्मेदार जगाने में सफल हो पा रहे हैं। झाड़ी के कांटों और पहाड़ी पर अबोध मिलने पर जिम्मेदारों की आंख खुलती है।

सीकर

Published: April 03, 2022 05:27:31 pm

सीकर. अपनों के बिसराए मासूमों को पालने के लिए हम जाग रहे ना जिम्मेदार जगाने में सफल हो पा रहे हैं। झाड़ी के कांटों और पहाड़ी पर अबोध मिलने पर जिम्मेदारों की आंख खुलती है। जागरूकता के कार्यक्रम शुरू करने के साथ जिले के स्वास्थ्य केन्द्रों पर पालने लगाने के दावे किए जाते हैं, लेकिन यह दावे कागज और निर्देशों में ही दफन हो जाते हैं। शहर के जीणमाता क्षेत्र में शिशु और पालने में कन्या मिलने के बाद जिम्मेदारों के दावों पर नजर डाली तो कुछ ऐसा ही नजर आया। जिले में लगातार मिल रहे मासूम बालक व कन्याओं के मामलों को देखते हुए गत वर्ष अक्टूबर माह में कलक्टर अविचल चतुर्वेदी ने राजकीय संप्रेक्षण एवं किशोर ग्रह का निरीक्षण कर ऐसे मामलों की रोकथाम के लिए संबंधित विभागों के अधिकारियों की बैठक ली। साथ ही जिले के उपखंड अधिकारियों को अपने क्षेत्रों में जन सहयोग से पालने लगवाने के निर्देश दिए थे, लेकिन एक भी उपखंड क्षेत्र में अभी पालना नहीं लग पाया है। जागरूकता की स्थिति यह है कि चार दिन पहले ही जीणमाता क्षेत्र की पहाडिय़ों में बालक मिला है।

35 नवजात शिशुओं को फेंका, पर प्रशासन का
35 नवजात शिशुओं को फेंका, पर प्रशासन का

आंचल के दूध से दूर हुए 35 मासूम
सीकर जिले में पिछले दस वर्ष में 35 मासूम अपनी मां के आंचल के दूध से दूर हुए हैं। इनमें से महज को ही अपनों ने सरकारी पालने में छोड़ा गया है। 23 मासूमों को अपनों ने कभी कांटों में तो कभी पेड़ के पत्तों के बीच छोड़ा है। अपनों से बिसराए जाने के बाद भी अधिकतर जीवन की जंग जीत गए, लेकिन आठ मासूमों की मौत हो गई। विभाग के आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो अब तक 23 को गोद दे दिया गया। तीन को वापस माता-पिता के सुपर्द कर दिया गया है।

मै...नहीं पाल सकती बच्चा...सरकार को किए तीन बच्चे सुपुर्द

जन्म के बाद बच्चों को बिसराने के बढ़ते मामलों के बीच सीकर जिले के तीन उदाहरण जागरूकता की बड़ी मिशाल भी है। समझाइश पर इन मांओं ने अपने लाल को विभाग को सुपर्द कर दिया। राजकीय संप्रेक्षण एवं किशोर ग्रह की अधीक्षक डॉ. गार्गी शर्मा का कहना है कि विभाग को बच्चा सुपुर्द करने वाले व्यक्ति की पहचान किसी भी स्तर पर सार्वजनिक नहीं की जा सकती। यहां तक की न्यायालय में भी नहीं। बच्चा सुपुर्द करने के लिए कोई विशेष प्रकिया भी नहीं अपनानी पड़ती। इसकी सूचना देने पर ही सीडब्ल्यूसी और विभाग के सदस्य पहुंच कर आवेदन की प्रक्रिया पूरी करते हैं। इसके लिए महज दो गवाहों के हस्ताक्षर करवाने होते हैं।


समाज के दंश ने किया मजबूर...
बच्चा सुपुर्द करने के तीनों मामलों पर नजर डाली तो सामने आया कि समाज की कमजोर होती मानसिकता ने उन्हें यह दंश दिया था। बलात्कार की शिकार होने के बाद आरोपी पुलिस की गिरफ्त में आ गया, लेकिन उसे ऐसा दर्द दे गया, जिसे वह कभी नहीं भूल सकती। परिवार के लोगों ने छिपा कर उसका प्रसव करवाया। आखिर विभाग और पुलिस की समझाइश पर उसने बच्चे को सरेंडर किया जिले के दूसरे दो अन्य मामलों में भी ऐसा ही तथ्य सामने आया है।


आंचल से दूर होती कन्या...

मां के आंचल से दूर होने वाले मामलों की संख्या देखी जाए तो 2012 से अब तक 20 बालिकाओं को जन्म लेने के कुछ समय बाद ही अपनों ने बिसराया है। जबकि बालकों की संख्या 15 रही है। इनमें से किसी भी मामले में पुलिस इनके परिजनों की तलाश नहीं कर पाई।


लावारिश बच्चे मिलने की स्थिति
वर्ष कन्या बालक

2012-01-00
2013-02-00

2014-02-01
2015-03-01

2016-03-02
2017-03-01

2018-00-01
2019-04-02

2020-02-01
2021-03-03

2022-00-02

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