दोनों हाथ गंवाने वाले भरत ने पैरों से की लिखाई, परीक्षा देकर बना कृषि पर्यवेक्षक

प्रतिभा कभी किसी की मोहताज नहीं होती। इंसान में हौसला हो तो हर मंजिल आसान हो जाती है। यही साबित कर दिखाया है राजस्थान के सीकर जिले के दांतारामगढ़ की चैनपुरा पंचायत के श्यामपुरा गांव निवासी भरत सिंह ने।

By: Sachin

Published: 17 Sep 2020, 08:32 AM IST

रणवीर सिंह सोलंकी

सीकर/ खाचरियावास। प्रतिभा कभी किसी की मोहताज नहीं होती। इंसान में हौसला हो तो हर मंजिल आसान हो जाती है। यही साबित कर दिखाया है राजस्थान के सीकर जिले के दांतारामगढ़ की चैनपुरा पंचायत के श्यामपुरा गांव निवासी भरत सिंह ने। जिसने बचपन में हादसे में दोनों हाथ गंवाने के बाद भी हिम्मत नहीं हारी और पैरों से लिखते-लिखते न केवल अपनी पढ़ाई पूरी की बल्कि, अब कृषि पर्यवेक्षक पद पर चयन भी हासिल कर लिया है। भरत की इस उपलब्धि पर आज पूरा जिला जहां गौरव कर रहा है। वहीं, भरत की मेहनत व लगन से पाया गया यह मुकाम देशभर में चर्चा का विषय बन गया है।

करंट में गवाएं दोनों हाथ

भरत सिंह जब 8 साल का था, तब बिजली का करंट लगने से उसके दोनों हाथ झुलस गए थे। चिकित्सकों के प्रयास के बावजूद उसके दोनों हाथ नहीं बचाये जा सके। उन्हें आखिरकार काटने पड़े। लेकिन, दोनों हाथ गंवाने के बावजूद भरत ने हार नहीं मानी। उसने पढ़ाई जारी रखने की ठानी। डगर कठिन होने के बावजूद उसने पैर से लिखने का अभ्यास शुरू किया। कुछ दिनों में वह पैर से लिखने में पारंगत हो गया। समीपवर्ती रेनवाल कस्बे के सनराइज स्कूल से प्रथम श्रेणी से सीनियर करने के बाद उसने राजस्थान कॉलेज में दाखिला लिया। वहां से बीएससी की परीक्षा पास की गरीब परिवार के होनहार विद्यार्थी की पढ़ाई में सनराइज स्कूल के निदेशक एडवोकेट रामेश्वर धायल व राजस्थान कॉलेज के निदेशक जगदीश बांगड़वा ने भी भरत की पढ़ाई में मदद की। बीएससी करने के बाद उसने दो वर्ष तक जयपुर में बहन के पास रहकर परीक्षा की तैयारी की। वर्ष 2018 में कृषि पर्यवेक्षक की परीक्षा दी। आखिरकार मेहनत रंग लाई और उसका कृषि पर्यवेक्षक के पद पर चयन हो गया। 25 वर्षीय भरत हाथ से लिखने वाले किसी अन्य अच्छे विद्यार्थी की तरह पैर से सुंदर लिखता है।

बचपन में उठा मां का साया, पिता व दादी ने पाला
भरत का मां से भी बचपन में ही बिछोह हो गया। मां का साया सिर से उठ जाने के बाद भरत को कृषक पिता तेज सिंह व दादी ने ही लाड़ प्यार से पाला। अपनी कामयाबी पर खुश होते हुए भरत ने बताया कि जब 8 वर्ष की उम्र में दोनों हाथ करंट की वजह से कट गए थे, उसी समय मैंने ठान लिया था कि मुझे हर हाल में पढ़ लिखकर अच्छी नौकरी पानी है ताकि परिवार पर बोझ ना बन कर उनका सहारा बन सकूं।

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