गरीबी की ग्राउंड रिपोर्ट: भूख लगने पर कीकर के खोखे खाकर, तो कहीं खाली पेट सो रहे मासूम

सचिन माथुर
सीकर. जर्द चेहरा...भूख से सिकुड़ते पेट..आंखों में मौत का खौफ और चित में चिंताओं की सुलगती चिताएं ..। रोते- कलपते व भूख से बिलखते बच्चों और उन्हें फुसलाते मां-बाप की झकझोर देने वाली तस्वीरें कच्ची बस्ती में आम हो गई है।

By: Sachin

Published: 28 May 2021, 02:09 PM IST

सीकर. जर्द चेहरा...भूख से सिकुड़ते पेट..आंखों में मौत का खौफ और चित में चिंताओं की सुलगती चिताएं ..। रोते- कलपते व भूख से बिलखते बच्चों और उन्हें फुसलाते मां-बाप की झकझोर देने वाली तस्वीरें कच्ची बस्ती में आम हो गई है। छोटी-मोटी मजदूरी व मांगकर पेट भरने वाले यहां के परिवारों को लॉकडाउन में काम नहीं मिल रहा, तो मांगने पर कोरोना के डर से लोग इन्हें दूर से ही दुत्कार रहे हैं। ऐसे में कई परिवारों को यहां एक वक्त का खाना भी मुश्किल से मयस्सर हो रहा है। हालात ये हैं कि छोटे-छोटे बच्चों का पूरा-पूरा दिन भूख से बिलखते हुए तो कहीं कीकर के खोखे (फलियां) खाकर बीत रहा है। पत्रिका ने जब नेहरु पार्क व हाउसिंग बोर्ड स्थित कच्ची बस्तियों के हाल देखे तो कई ऐसे ही कई मंजर सामने आए। पत्रिका टीम की खास रिपोर्ट।


केस एक: कीकर के खोखे खाकर पेट भरता है धर्मनाथ का परिवार

सालासर रोड स्थित कच्ची बस्ती में धर्मनाथ कालबेलिया पत्नी व चार बच्चों के साथ झुग्गी में रहता है। 8 व 13 साल के बेटे कृष्ण व किशन मूक-बधिर है। 12 साल की बेटी मानसिक विक्षिप्त है। छह साल का सबसे छोटा लखन नासमझ है। पत्नी विनोद कंवर की मानसिक स्थिति भी सही नहीं है। लॉकडाउन से पहले तक वह छोटी-मोटी मजदूरी करके परिवार पाल रहा था। लेकिन, अब उसके पास कोई काम नहीं रहा। विक्षिप्त व दिव्यांग बच्चों सहित पूरा परिवार भूख से सूखा सा जा रहा है। आलम यह है कि भूख मिटाने के लिए परिवार अक्सर कीकर के पेड़ से झडऩे वाली सूखी फलियां इक_ा कर लाता हैं और भूख लगने पर उन्हें ही चबाकर पानी पीकर सो जाता है। पत्रिका की टीम भी जब धर्मनाथ के झोपड़े में पहुंची तो भी मासूम बच्चों सहित धर्मनाथ उन्हीं फलियों को खाता मिला। धर्मनाथ ने बताया कि ना तो काम रहा और ना ही भीख मिल रही है। परिवार का पालन पूरी तरह मदद पर निर्भर हो गया है। कभी कभार कोई भामाशाह व आसपास के लोग कुछ दे जाते हैं तो परिवार पेट भरकर खाना खा लेता है। वरना सूखी फली खाकर या कभी कभार तो परिवार भूखे पेट ही सोता है।

केस दो: गरीबी की जंजीर में जकड़ा शांति देवी का जीवन
सालासर रोड स्थित कच्ची बस्ती में बूढ़ी विधवा शांति देवी बीपीएल परिवार की मुखिया है। दो बेटे रामधन व गोरू मानसिक विक्षिप्त है। जिनमें सुरक्षा के लिहाज से रामधन को बरसों से जंजीरों में बंाध रखा है। एक बेटे बबलू की लॉकडाउन में मजदूरी छिन गई और चौथा उदीनाथ अपने दो बच्चो को यहां छोड़कर खुद अलग-थलग रहता है। रामधन व बबलू के भी दो-दो बच्चे हैं। ऐसे में 12 सदस्यों का ये पूरा परिवार है। जिसमें लॉकडाउन में आय का अब कोई स्रोत नहीं है। बीपीएल कार्ड की वजह से शांति देवी को जरूर चार सदस्यों का सरकारी अनाज मिलता है। लेकिन, उससे 12 सदस्यों की पेट भराई नामुमकिन है। ऊपर से बेटों के इलाज के लिए लिया दो लाख से ज्यादा के कर्ज की ङ्क्षचता भी शांति देवी को सता रही है। पत्रिका टीम ने जब शांति देवी के हाल जानने चाहे तो दर्द छलछलाई बूढ़ी आंखों में ही दिख गया। हाथ जोड़कर कहने लगी 'साहब, कुछ मिलता है तो खा लेते हैं, नहीं तो कभी भूखे भी रह जाते हैं।


केस तीन : एक समय पेट भरना भी मुश्किल

हाउसिंग बोर्ड स्थित कच्ची बस्ती में 85 वर्षीय गजरा लकड़ी व बांस की झुग्गी में रहती है। बेटा नहीं होने पर उसने पहले नाती को अपने साथ रखा। लेकिन, शादी व चार बच्चे होने के बाद 2016 में एक हादसे में उसकी मौत हो गई। इसके बाद पत्नी भी चार बच्चों का बोझ गजरा पर डालकर घर छोड़ गई। तब से गजरा जैसे-तैसे मांग कर अपना व उन बच्चों का पेट भर रही थी। पर अब बीमारी व लॉकडाउन ने वो रास्ता भी बंद कर दिया। खुद के साथ 9 वर्षीय पूनम, 11 वर्षीय विकास, 13 वर्षीय विजय व 15 वर्षीय अजय का पेट भरना अब पूरी तरह घर तक पहुंचने वाली मदद पर निर्भर हो गया है। गजरा बताती है कि लंबे समय से वह एक ही समय भोजन बना रही है। जो भी अब मुश्किल होता जा रहा है।

केस चार: मदद पर टिका विधवा मां-बेटी का जीवन
हाउसिंग बोर्ड स्थित बस्ती में बसंती ने भी चार साल पहले अपने पति को खो दिया। तब से वह अपनी 15 वर्षीय इकलौती बेटी पूनम के साथ छोटी सी झोपड़ी में रहती है। मानसिक स्थिति कमजोर होने पर बसंती मजदूरी करने मेें भी असमर्थ है। यह परिवार भी पूरी तरह मदद पर टिका है। खास बात ये भी है कि पूनम को पढऩे का बहुत शौक है। निशुल्क करणी स्कूल में पढऩे के साथ वह झुग्गी में भी बैठी दिन में पढ़ती ही रहती है।


पत्रिका व्यू: बस्तियों का हो सर्वे, तो मिले राहत

प्रशासन को कच्ची बस्तियों का सर्वे करवाना चाहिए। जिसमें लोगों के मूल स्थान, जनसंख्या, सामाजिक व आर्थिक स्थिति की जानकारी ली जाए। इससे जरुरतमंदों के साथ समाजकंटकों की भी पहचान हो सकेगी। जो सेवा कार्यों व शहर की सुरक्षा दोनों के काम की होगी। वहीं भामाशाहों को मदद के लिए यहां आगे आना चाहिए।

लॉकडाउन में कठिन हुई इनकी जिंदगी
लॉकडाउन में कच्ची बस्ती के लोगों की जिंदगी ज्यादा कठिन हो गई है। बहुत से परिवार एक वक्त का खाना भी नहीं जुटा पा रहे हैं। कुछ संगठन व भामाशाह जरूर सहयोग कर रहे हैं, लेकिन जरुरतमंदों की संख्या के हिसाब से वह अब भी बहुत कम है। जरूरी है कि और भी भामाशाह आगे आकर कच्ची बस्ती में मदद बढ़ाए। ताकि इस मुश्किल वक्त से उन्हें भी उबारा जा सके।

शैतान सिंह कविया, सामाजिक कार्यकर्ता, सीकर

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