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Children's day: निराश्रित आश्रम में पले- बढे विशेष बच्चों ने जीवन में सफलता कर दिखाई राह

locationसीकरPublished: Nov 14, 2022 01:04:03 pm

Submitted by:

Sachin Mathur

मोहम्मद रफीक चौधरी

सीकर. आम तौर पर निराश्रित आश्रम का जिक्र आते ही बेसहारा व लाचार बच्चों की तस्वीर जेहन में उभरती है। इसके विपरीत कुछ ऐसे युवा भी हैं, जिन्होंंने बाल निराश्रित गृह में रहकर पढाई- लिखाई की और अभावों और शारीरिक कमजोरी से लडक़र लगन और मेहनत से जीवन में खास मुकाम हासिल किया है।

बाल दिवस विशेष: निराश्रित आश्रम में पले- बढे विशेष बच्चों ने जीवन में सफलता कर दिखाई राह
बाल दिवस विशेष: निराश्रित आश्रम में पले- बढे विशेष बच्चों ने जीवन में सफलता कर दिखाई राह

सीकर. आम तौर पर निराश्रित आश्रम का जिक्र आते ही बेसहारा व लाचार बच्चों की तस्वीर जेहन में उभरती है। इसके विपरीत कुछ ऐसे युवा भी हैं, जिन्होंंने बाल निराश्रित गृह में रहकर पढाई- लिखाई की और अभावों और शारीरिक कमजोरी से लडक़र लगन और मेहनत से जीवन में खास मुकाम हासिल किया है। उन्होंने जज्बे और जुनून की बदौलत समाज में व्याप्त इस मिथक को झुठलाया है कि निशक्तता और गरीबी से लडऩा हर किसी की बस की बात नहीं है। बाल दिवस के मौके पर राजस्थान पत्रिका कुछ ऐसे ही होनहारों की सक्सेस स्टोरी प्रकाशित कर रहा है, जो समाज के विशेष तबके के साथ नौजवानों के लिए भी मिसाल है।

पहले निशक्तता से जंग, अब कर रही मरीजों की सेवा
जिले के लक्ष्मणगढ़ इलाके की मीरण गांव निवासी होनहार बेटी इंदिरा कुमारी जीवटता व जज्बे की मिसाल है। केसूराम की यह लाडली बेटी बचपन से ही पैर से निशक्त थी। शारीरिक व आर्थिक परेशानी के चलते उसे भादवासी स्थित कस्तूरबा सेवा संस्थान में दाखिल करवाया गया। उसने उच्च प्राथमिक लेकर 12 वीं तक की शिक्षा यहीं से हासिल की। इसके बाद यहीं रह कर एसके अस्पताल से नर्सिंग की तथा सरकारी नौकरी हासिल की। इंदिरा फिलहाल जिले के खाचरियावास गांव के सरकारी अस्पताल में बतौर नर्स सेवाएं दे रही हैं।

मां ईंट- भट्टे मजदूर, बेटा बना सरकारी कर्मचारी
श्रीमाधोपुर इलाके के खेड़ी जाजोद निवासी संजय कुमार वर्मा की सफलता भी किसी फिल्मी कहानी की तरह है। पिता का साया बचपन में ही सिर से उठ गया था। मां ने जैसे तैसे करके ईंट भट्टों पर मजदूरी करके परिवार को पाला। बेटे को अच्छी शिक्षा के लिए निराश्रित आश्रम में प्रवेश दिलाया। प्राइमरी से लेकर बीएएससी तक की शिक्षा हासिल की। साथ- साथ प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करते रहे। 2018 में लिपिक भर्ती परीक्षा पास की तथा फिलहाल जयपुर में सार्वजनिक निर्माण विभाग में बतौर वरिष्ठ लिपिक सेवाएं दे रहे हैं।

चार भाई बहनों का सहारा बना आईआईटीयन
प्रदीप कुमार वर्मा पुत्र प्रहलाद राम की सफलता की कहानी भी प्रेरणादायी है। पांच साल की उम्र में माता- पिता का साया सिर से उठ गया। पीछे रहे गए उसके साथ तीन भाई बहन और परेशानियों का पहाड़। रिश्तेदारों ने चारों भाई- बहनों को कस्तूरबा सेवा संस्थान में भर्ती करवा दिया। प्रदीप ने भाई बहनों को संभाला और लगन और मेहनत से पढाई कर आईआईटी परीक्षा में 1495 वीं रैंक हासिल की। बीटेक करने के बाद प्रदीप नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन में बतौर इंजीनियर सेवाएं दे रहा है।

बचपन में मां- बाप का साया उठा, दोनों भाई कर रहे व्यवसाय
उदयपुरवाटी इलाके के मणकसास के दो भाइयों ने मिलकर मेहनत व लगन से अभावों व कुदरत के मजाक से लडक़र समाज में अपना मुकाम हासिल किया। सचिन कुमार व गट्टू गुर्जर के माता और पिता दोनों कम उम्र में ही गुजर गए। दोनों ने कस्तूरबा सेवा संस्थान में रहकर पढाई की। बड़े भाई सचिन ने आयुर्वेद नर्सिंग व फार्मेसी में डिप्लोमा किया तथा अपने दम पर मेडिकल स्टोर खोला। छोटे ने भी इसमें हाथ बंटाया। दोनों भाई अच्छा कारोबार कर उद्यमशीलता की मिसाल है।

दोनों पैर से निशक्त, खुद का मेडिकल स्टोर
उदयपुरवाटी इलाके के ही पचलंगी निवासी राजेंद्र प्रसाद वर्मा भी शारीरिक अपंगता से जंग की मिसाल है। बचपन में ही दोनों पैर गंवाने वाले राजेंद्र को आर्थिक परेशानी के चलते ेकस्तूरबा सेवा संस्थान मेे दाखिल करवा दिया। उसने यहां पांचवीं से लेकर 12 वीं कक्षा तक पढाई की तथा शारीरिक कमजोरी को हावी नहीं होने दिया। आयुर्वेद नर्सिंग व फार्मेसी में डिप्लोमा हासिल किया और अपने दम पर मेडिकल स्टोर शुरू किया। अब अच्छा खासा कारोबार कर परिवार का सहारा बने और इस तरह के लोगों को राह दिखाई।

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