पति-पत्नी की मौत के बाद 26 बीघा जमीन के लिए कोर्ट ने 25 साल बाद सुनाया अहम फैसला

पति-पत्नी की मौत के बाद 26 बीघा जमीन के लिए कोर्ट ने 25 साल बाद सुनाया अहम फैसला
पति-पत्नी की मौत के बाद 26 बीघा जमीन के लिए कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला, पढ़ें पूरी खबर

Naveen Parmuwal | Updated: 21 Sep 2019, 11:50:05 AM (IST) Sikar, Sikar, Rajasthan, India

ये कहानी है लक्ष्मणगढ़ के भगवानी और हुकमाराम की। दोनों के कोई संतान नहीं थी। दोनों के मरने के बाद 26 बीघा कृषि भूमि ( Agricultural Land ) को लेने के लिए Court में कई दावे पेश हुए।

विक्रम सिंह सोलंकी, सीकर.

ये कहानी है लक्ष्मणगढ़ के भगवानी और हुकमाराम की। दोनों के कोई संतान नहीं थी। दोनों के मरने के बाद 26 बीघा कृषि भूमि ( Agricultural Land ) को लेने के लिए Court में कई दावे पेश हुए। किसी ने दत्तकपुत्र बताया तो किसी ने कोर्ट में कृषि भूमि को बेचने का इकरारनामा पेश किया। कोर्ट ने 25 साल बाद 26 बीघा कृषि भूमि को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। अपर जिला न्यायाधीश संख्या तीन यशवंत भारद्वाज ने घासीराम बनाम धन्नाराम एवं अन्य में 25 साल पहले कृषि भूमि के विक्रय को निरस्त किया। उन्होंने 26 बीघा जमीन को शिशुपाल पुत्र मालीराम एवं रामस्वरूप पुत्र परमेश्वरलाल को वसीयत के आधार पर कृषि भूमि देने के आदेश दिए। घासीराम ने कोर्ट में दावा पेश किया था। लक्ष्मणगढ़ के सिंगडोला बड़ा में खसरा नंबर 106 के 26 बीघा 12 बिस्वा कृषि भूमि भगवानी और हुकमाराम की थी। 24 जून 1989 को 56 हजार सौ रुपए में उन्होंने बीरमाराम को बेच कर रजिस्ट्री करा दी। 7 अप्रैल 1992 को 60 हजार रुपए में धन्नाराम के नाम बेचनामा कर दिया।


इसकी एवज में 50 हजार रुपए नगद लिए और 10 हजार रुपए बाद में देने को तय हुआ। उन्होंने जमीन का कब्जा कर लिया। धन्नाराम ने कृषि भूमि को घासीराम के नाम इकरारनामा कर दिया। इसके बाद 15 मार्च 1995 को धन्नाराम को जमीन को नाम कराने के लिए कहा तो वह मुकर गया और बाकि के 10 हजार रूपए देने से मना कर दिया। घासीराम ने कोर्ट में इकरारनाम पेश कर जमीन का दावा पेश किया। कोर्ट में 25 साल से अधिक समय तक मामला चला। इस बीच कोर्ट में रामस्वरूप और शिशुपाल ने कृषि भूमि का वसीयतनामा कोर्ट में पेश किया। कोर्ट ने दोनों पक्षों के दस्तावेज और बहस सुनने के बाद दावा निरस्त करते हुए फैसला सुनाया।


मरने से पहले से नाम की वसीयत की
भगवानी और हुकमाराम ने रामस्वरूप और शिशुपाल के नाम मरने से पहले ही वसीयत नाम कर दी थी। जबकि प्रमाणित हुआ कि बीरमाराम के नाम केवल पावर आफ अटार्नी की गई थी जोकि मरने के बाद स्वत: रद्द मानी गई। इसी बीच 1992 में भगवानी बनाम धन्नाराम का एक दावा भी कोर्ट में पेश किया गया। जिसमें घासीराम भी गवाह था और कहा था कि आप दावे को कैंसिल कर सकते है। मुझे कोई आपति नहीं है। इसमें प्रमाणित हुआ था कि धन्नाराम ने गलत तरीके से डिक्री करवा ली थी। बीरमाराम के इकरारनामे के भी कैं सिल कर दिया गया था। इसी आधार पर रजिस्ट्री का कोई मतलब नहीं पाया गया।

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मृतक भगवानी और मृतक हुकमा का असली वारिस कौन ?
25 साल तक मामले में कोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि मृतक भगवानी का असली वारिस रामेश्वर है या रामस्वरू प तथा मृतक हुकमा का असली वारिस जगदीश है या फिर शिशुपाल है। बहस के दौरान पाया गया कि कोर्ट में रामस्वरूप और शिशुपाल ने अपने दावे को दस्तावेज पेश कर साबित किया है। जबकि रामेश्वर और जगदीश ने अपने समर्थन में कोई भी कोई भी मौखिक व दस्तावेजों के साक्ष्य पेश नहीं किए है। दस्तावेजों के आधार पर प्रमाणित किया गया कि रामेश्वर के पिता का नाम गुमानाराम और जगदीश के पिता का नाम सुरजाराम है। बयानों में सामने आया कि हुकमा गूंगा, बहरा व अनपढ़ था। वह अपना काम स्वयं करता था। भगवानी बेवा ईशरा का वसीयत वारिस रामस्वरूप और हुकमा का वसीयत वारिस शिशुपाल है। दोनों को ही वे पहले से जानते थे। वसीयत के समय दोनों स्वस्थ थे और साथ ही घूमाफेरी करते थे। बयानों के आधार पर दोनों की वसीयत सही पाई गई। दोनों ने अपने जीवनकाल में किसी को गोद नहीं लिया।


गोद लेने का दावा पेश किया
कृषि भूमि के विवादित होने अलग-अलग इकरारनामा कोर्ट में पेश किए गए। वहीं कोर्ट में रामेश्वर ने भगवानी का दत्तक पुत्र होने का दावा पेश किया था उसने 26 जनवरी 2002 को राशन कार्ड भी बनवा लिया था। इसके अलावा जगदीश ने भी हुकमाराम का दत्तकपुत्र होने का दावा पेश किया था। बयानों और दस्तावेजों में रामेश्वर को गुमानाराम का पुत्र माना गया। राशन कार्ड को भी अवैध करार दिया गया। जगदीश ने दस्तावेज पेश नहीं किया था। जिसे मौखिक रूप से पाए जाने पर खारिज कर दिया गया।


25 साल तक कोर्ट का बहुमूल्य समय बेकार किया
अपर न्यायाधीश संख्या तीन यशवंत भारद्वाज ने घासीराम का दावा निरस्त करते हुए कि 25 साल तक कोर्ट का बहुमूल्य समय बेकार किया है। इससे कई बड़े मामलों पर प्रभाव पड़ा है। उन्होंने फैसले में लिखा कि करार की 50 हजार रुपए की राशि को 6 प्रतिशत ब्याज के साथ जिला विधिक सेवाप्राधिकरण में एक माह में जमा कराने को कहा। उन्होंने घासीराम की ओर किए गए दावे को खारिज करते अस्वीकार कर दिया।

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