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त्रिपुष्कर योग में पांच दिवसीय दीपोत्सव का आगाज आज से

पांच दिवसीय दीपोत्सव आज से शुरू हो गया है। रोशनी के पर्व के लिए शहर सज-धजकर तैयार है।

सीकर

Published: November 02, 2021 08:40:02 am

सीकर. पांच दिवसीय दीपोत्सव आज से शुरू हो गया है। रोशनी के पर्व के लिए शहर सज-धजकर तैयार है। शहर के प्रमुख बाजार, गली चौराहे सजने लगे हैं। धनतेरस पर बिक्री को लेकर व्यापारियों ने भी तैयारी कर ली है। पांच दिवसीय दीपोत्सव का आगाज मंगलवार को धन तेरस से होगा। इन पांच दिनों में देवताओं का पूजन का विशेष महत्व है, जो धनाध्यक्ष कुबेर के पूजन से शुरू होकर मृत्यु के देवता यमराज के लिए दीपदान तक चलता है। धनतेरस मंगलवार को मनाई जाएगी। तेरस तिथि सुबह 11:31 बजे से शुरू होगी और बुधवार को सुबह 9:03 तक रहेगी। इस बार चतुर्दशी तिथि का क्षय हुआ है।

त्रिपुष्कर योग में पांच दिवसीय दीपोत्सव का आगाज आज से
त्रिपुष्कर योग में पांच दिवसीय दीपोत्सव का आगाज आज से

कुबेर एवं धन्वंतरि की पूजा
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी धन तेरस के नाम से जानी जाती है। धसतेरस में 'धनÓ शब्द का संबंध संपत्ति के अधिपति कुबेर के साथ आरोग्य के प्रदाता धन्वन्तरि से भी है। इसीलिए इस दिन चिकित्सक लोग अमृतधारी भगवान धन्वन्तरि का पूजन करते हैं। इस दिन से दीप जलाने की शुरुआत होती है, और पांच दिनों तक जलाए जाते हैं। मान्यता है कि इस दिन खरीदे गए सोने या चांदी के धातुमय पात्र अक्षय सुख देते हैं। इस नाते लोग नए बर्तन या दूसरे नए सामान धनतेरस के दिन ही खरीदते हैं। एक परंपरा यह भी है कि इस दिन नव-निधियों के नाम का उच्चारण किया जाए। नौ निधियों के नाम हैं - महापद्म, पद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुंद, कुंद, नील और खर्व।


धनतेरस पूजा शुभ मुहूर्त

पंडित दिनेश मिश्रा के अनुसार धनतेरस,मंगलवार 2 नवंबर को प्रदोष काल शाम 5 बजकर 37 मिनट से रात 8 बजकर 11 मिनट तक का है ।
वृष लग्न शाम 6.18 मिनट से रात 8.14 मिनट तक रहेगा।

धनतेरस पर चौघडिय़ा मुहूर्त

वाहन खरीदने के लिए
प्रात: 9:26 से प्रात: 10:48 तक चर का चौघडिय़ा।

आभूषण इलेक्ट्रॉनिक आइटम व सभी प्रकार की खरीदारी के लिए लाभ व अमृत का चौघडिय़ा सुबह 10:48 से दोपहर 1:33 तक।
बही बसना खरीदने के लिए शुभ का चौघडिय़ा दोपहर 2:55 से 4:17 तक।

गौरतलब है कि धनतेरस पर इस बार सर्वसिद्धिदायक त्रिपुष्कर योग सूर्योदय से दिन के 11:31 तक रहेगा। यह सभी शुभ कार्यों में सिद्धि दायक कहा गया है।

रूपचौदस: तीन नवंबर बुधवार को सुबह 9:58 से सर्वार्थ सिद्धि योग होगा। इस दिन हस्त नक्षत्र का संयोग बनेगा चंद्रमा कन्या राशि में रहेगा। जो सभी कार्यों में सिद्धिदायक हैं। दीपावली से ठीक एक दिन पहले आने वाली चतुर्दशी तिथि को भगवान विष्णु ने माता अदिति के आभूषण चुराकर ले जाने वाले निशाचर नरकासुर का वध किया था। परम्परा में इसे शारीरिक सज्जा और अलंकार का दिन भी माना गया है, इसलिए इसे रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है। इस दिन महिलाएं ब्रह्म मुहूर्त में हल्दी चंदन सरसो का तेल मिलाकर उबटन तैयार कर शरीर पर लेप कर उससे स्नान करती है और अपना रूप निखारती है।


ज्योति पर्व है दीपोत्सव- गुरुवार,4 नवम्बर
कार्तिक अमावस्या सनातन प्रकाश पर्व के रूप में स्थापित है। यह दिन अंधेरे की अनादि सत्ता को अंत में बदल देता है, जब छोटे-छोटे ज्योति-कलश दीप जगमगाने लगते हैं। यह दिन लक्ष्मी पूजा के लिए प्रशस्त है। किसानों की बरसाती फसल दीवाली से पहले पककर तैयार हो जाती है। इस नाते यह आनंद-वितरण करने वाला उत्सव है। इस दिन सायं (जिसे प्रदोषकाल कहा जाता है) माता लक्ष्मी की आराधना की जाती है।

गणपति, कुबेर और भगवान विष्णु की पूजा भी माता लक्ष्मी के साथ होती है। सुख, सौभाग्य और सम्पत्ति की प्रदात्री भगवती सिंधुजा की पूजा नए धान और उपलब्ध पत्र-पुष्पों से होती है। स्पष्ट है कि माता लक्ष्मी के रूप में यह प्रकृति पूजन है जो शताब्दियों से चला आ रहा है। अथर्ववेद में लिखा है कि जल, अन्न और सारे सुख देने वाली पृथ्विी माता को ही दीपावली के दिन भगवती लक्ष्मी के रूप में पूजा जाता है। इसी कारण लक्ष्मी पूजन की मुख्य सामग्री गन्ना और अन्य ऐसे पदार्थ हैं, जो सर्वकाल और सार्वभौम सुलभ हैं।

गोवर्धन पूजा और अन्नकूट-शुक्रवार 5 नवम्बर
दीपावली का दूसरा दिन राजा बली पर भगवान विष्णु की विजय का उत्सव है। ऋग्वेद में उल्लेख है कि भगवान विष्णु ने वामन रूप धरकर तीन पदों में सारी सृष्टि को नाप लिया था। अत: तब से आज तक यह विष्णु विजय दिवस कहलाता है। भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन इन्द्र के मानमर्दन के लिए गोवर्धन को धारण किया था। ऐसे में नव धान्य के बने हुए पर्वत शिखरों का भोग अन्नकूट प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। वामनपुराण में इसे वीर-प्रतिपदा भी कहा गया है। इस दिन गो माता एवं बैलों की विशिष्ट पूजा की जाती है।

भाई-बहन के प्रेम का भाई दूज-शनिवार, 6 नवम्बर

कार्तिक शुक्ल तृतीय को एक सुन्दर उत्सव होता है, जिसका नाम है यमद्वितीया या भाई दूज। भविष्य पुराण में आया है कि इस दिन यमुना ने अपने भाई यम को अपने घर पर भोजन करने के लिए आमंत्रित किया था। इस दिन समझदार लोग अपने घर मध्याह्न का भोजन नहीं करते। लोगों को इस दिन अपनी बहन के घर में ही स्नेहवश भोजन करना चाहिए, जिससे कल्याण और समृद्धि प्राप्त होती है।

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