राजस्थान में यहां साक्षात प्रकट हो चुकी है मां लक्ष्मी, दो जिलों में आज भी मौजूद है सबूत

सीकर. दिवाली की अधिष्ठात्री देवी मां महालक्ष्मी का जिले के रघुनाथगढ़ से आस्था का एक अजब किस्सा जुड़ा हुआ है। जिसके तारों ने सीकर और जयपुर को भी आपस में जोड़ रखा है।

By: Sachin

Published: 13 Nov 2020, 10:56 AM IST

(Goddess Lakshmi has appeared here in sikar, Rajasthan) सीकर. दिवाली की अधिष्ठात्री देवी मां महालक्ष्मी का जिले के रघुनाथगढ़ से आस्था का एक अजब किस्सा जुड़ा हुआ है। जिसके तारों ने सीकर और जयपुर को भी आपस में जोड़ रखा है। किस्से के सबूत भी दोनों जगह आज भी कायम बताए जाते हैं। कहते हैं कि 352 साल पहले मां लक्ष्मी जिले के खोह यानी रघुनाथगढ़ में साक्षात प्रकट हुई थी। जिसके बाद एक गरीब पुरोहित वंश जयपुर कटले के मालिक से लेकर सीकर विधायक की कुर्सी तक पर राज कर चुका है। किस्से को लोग कोल कल्पित भी मानते हैं, लेकिन दो जिलों से जुड़े सबूत आज भी उसकी गवाही दे रहे हैं।

ठाकुर अलखां ने किया था आह्वान
इतिहासकार महावीर पुरोहित बताते हैं कि खोह यानी रघुनाथगढ़ में 352 साल पहले अलखां टकणेत का शासन था। हरिराम उनके कुल पुरोहित थे। दिवाली के दिन ठाकुर अलखां ने पुरोहित से बोहरा की दुकान से चावल और शक्कर लाने को कहा। लेकिन, पुरानी उधार चुकता नहीं होने पर उन्हें समान नहीं मिला। गुस्साए पुरोहित ने ठाकुर से नाराज होकर कहा कि कहीं ओर आसरा होता तो यह दिन नहीं देखना पड़ता। इस पर ठाकुर ने तांबे के टके पुरोहित को देकर घर पर तेल के दीये जलाने की बात कही। पुरोहित के घर के अलावा गांव में कहीं भी दिवाली नहीं मनाने की घोषणा के साथ मां लक्ष्मी के ध्यान में बैठ गए। कहते हें कि खुश होकर मां लक्ष्मी ठाकुर अलखां के सामने प्रकट हो गई और गढ़ का खजाना खोलने को कहा। इस पर ठाकुर ने उन्हें कुलगुरु के घर जाने की बात कही। मां लक्ष्मी जब पुरोहित के घर पहुंची तो उन्होंने भी मां लक्ष्मी को वापस ठाकुर के पास यह कहकर भेज दिया कि ठाकुर संपन्न होंगे तो उनकी पेट भराई अपने आप हो जाएगी। लेकिन, वापस आने पर ठाकुर ने लक्ष्मीजी को ब्राहम्ण को दान करने की बात कहते हुए वापस लौटा दिया। वापसी पर पुरोहित ने लक्ष्मीजी को स्थाई रूप से रहने की प्रार्थना की। इस पर मां लक्ष्मी ने जुए, नशे और वारांगनाओं से दूर रहने सरीखी शर्त के साथ स्थाई रूप से रहकर पुरोहित परिवार को धनी बना दिया।

विधायक पद, जयपुर का कटला और लाखों की आय
कहा जाता है कि मां लक्ष्मी के प्रवेश के बाद ही पुरोहित परिवार धनी हो गया। हरिराम पुरोहित के बेटे बद्रीदास ने नवाब फतेहपुर के पोतदार बनकर तासर की जागीर पाई और दूसरे बेटे मोहनराम जयपुर में सांगानेर के बड़े व्यापारी बन गए। बाकी बेटे चंपा का बास व चौमूं में बस गए। इन्हीं के वंशज घासीराम मुरलीधर को महाराजा सवाई जयसिंह ने संवत 1784 में जयपुर की बड़ी चौपड़ के खंदे में जमीन दी। जो पुरोहित का कटला बना। इतिहासकार पुरोहित बताते हैं कि सीकर के दूसरे शासक राव शिवसिंह ने पुरोहित घासीराम को संवत 1790 में सीकर में सुभाषचौक गढ़ के पास हवेली देकर बसाया। सबसे बड़ी जागीर के मालिक पुरोहित परिवार की उस जमाने में दो लाख रुपए प्रतिवर्ष आमदनी, एक लाख की जागीर और लाखों की कटले की आय हो गई थी। इसी परिवार के स्वरूप नारायण बाद में सीकर से विधायक रहे। जो जयपुर बैंक निदेशक सीकर के मजिस्ट्रेट, जयपुर के चेयरमैन और आजीवन पीसीसी सदस्य रहे।

इन सबूतों का हवाला
कहते हैं कि हरिराम पुरोहित के घर मां लक्ष्मी के आने की बात लोहागर्ल में तपस्या कर रहे साधु महरवानजी ने जान ली थी। इस पर वह भी पुरोहित के घर पहुंच गए थे। मां लक्ष्मी के दर्शनों के बाद वह निरंजनी साधु बनकर गांव से निकल गए थे। इन्हीं महरवान बाबा की गद्दी जयपुर पुरोहितजी के कटले में आज भी है। बाबा के चौमूं पुरोहितान में समाधि स्थल पर भी हर साल माघ महीने में मेले का आयोजन होता है। इतिहास की किताबोंं में अलखां और महरवानजी का नाम, जयपुर में पुरोहितजी का कटला, सीकर में पुरोहित जी की हवेली और पुरोहितजी के घर लक्ष्मी के वास की चर्चाएं इस किस्से के सबूत माने जाते हैं।

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