हाथी भी नहीं हिला सके इस प्रतिमा को, जानिए क्या खास बात है इस प्रतिमा में

सीकर के लक्ष्मणगढ़ के श्रीजी मन्दिर दानवदलन हनुमान सिद्धपीठ का अनूठा है इतिहास

 

By: vishwanath saini

Updated: 10 Nov 2017, 02:26 PM IST

प्रभाष नारनौलिया
लक्ष्मणगढ़. कस्बे में नवलगढ़ रोड पर कबूतरिया कुआं के पास वैष्णव निरंजनी संप्रदाय का श्रीजी (चतुर्भुज भगवान श्रीकृष्ण व राधा) तथा वीर हनुमान मन्दिर स्थित है। मंदिर 374 साल पुराना है। खुद लक्ष्मणगढ़ कस्बे की स्थापना भी मंदिर से सौ साल बाद हुई। इस मंदिर से कई रोचक किस्से व कहानियां जुड़ी हुई है। उनमें एक वाकया है कि मंदिर की प्रतिमा को सीकर राजा के हाथी तक नहीं हिला पाए थे।


प्रतिमा रखी बैल अपने आप रुक गए

-मन्दिर के वर्तमान महंत महावीर दास बताते हैं कि किसी जमाने में मन्दिर के सामने का मार्ग सुजानगढ़-सालासर से लोहार्गल-शाकम्भरी जाने का प्रमुख मार्ग था।
-विक्रमी संवत् 1740 में कुछ श्रद्धालु हनुमानजी की विशाल प्रतिमा को बैलगाड़ी में रखकर लोहार्गल की ओर से ला रहे थे।
-बैलगाड़ी कबूतरिया कुआं के पास पहुंची तब बैल अचानक रुक गए। श्रद्धालुओं ने अन्य ग्रामीणों के सहयोग से बैलगाड़ी को हिलाने की।
-बैलगाड़ी नहीं हिली तो विशाल प्रतिमा को उतारने की कोशिश की लेकिन इस बार भी नाकाम रहे।
-संयोगवश उसी समय वहां से सीकर के रावराजा अपने लवाजमे के साथ गुजर रहे थे।
-राजा यह दृश्य देखकर रुक गए तथा अपने सैनिकों को उस प्रतिमा को बैलगाड़ी से उतरवाने का आदेश दिया।
-प्रतिमा को राजा सैनिक तथा बाद में उनके सहयोग के लिए जुटे हाथी हिला ही नहीं पाए।
-मंदिर में साधनारत महंत नरीदास ने यह दृश्य देखकर राजा को कहा कि यह प्रतिमा इसी स्थान पर स्थापित होने की इच्छुक है।
-रावराजा के कहने पर महंत उस प्रतिमा को लेने आए तथा आश्चर्यजनक रूप से अपने शिष्य कल्याणदास के साथ मिलकर महन्त नरीदास ने दानव-दलन वीर हनुमान प्रतिमा को उठा लिया तथा लाकर मन्दिर में स्थापित कर दिया।

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श्रीजी मंदिर दानवदलन हनुमान सिद्धपीठ की स्थापना

महंत महावीर दास बताते हैं कि स्थापना को लेकर दो मत हैं, लेकिन प्रामाणिक मत के अनुसार मंदिर की स्थापना विक्रमी संवत् 1700 में हुई। उस समय लक्ष्मणगढ़ कस्बा बसा नहीं था। मन्दिर का स्थान पर निर्जन वन था। बताया जाता है कि वैष्णव निरंजनी संपद्राय के 12वें महंत नरीदास भ्रमण करते हुए यहां आए।

इस स्थान को उपयुक्त मानकर यहां एक ऊंचे टीले पर अपनी साधना शुरू की। महन्त नरीदास अपने साथ उस समय श्रीजी (चतुर्भुज भगवान श्रीकृष्ण व राधा) की प्रतिमा लाए थे, जिसे उन्होंने यहीं स्थापित कर दिया। उस समय यह क्षेत्र फतेहपुर के नवाबों के अधीन था। बाद में यहां पर दानव-दलन वीर हनुमान मन्दिर की प्रतिमा स्थापित की गई थी।


महंत एवं आराधना
महंत नरीदास से लेकर अब तक मन्दिर के 13 महन्त हुए हैं। मन्दिर के महंत शिष्य परम्परा से ही हुए हैं न कि पुत्र परम्परा से। तेरहवें महन्त के रूप में महन्त महावीरदास वर्तमान में मन्दिर में पूजा एवं आराधना सहित प्रभुसेवा प्रकल्पों में लगे हैं।

एक और दिलचस्प बात यह है कि सभी महन्त पूजा आराधना के साथ-साथ समाजसेवा में भी सक्रिय रहे हैं। मन्दिर के सभी पूर्ववर्ती महन्त आयुर्वेद चिकित्सक रहे हैं। निशुल्क चिकित्सा के माध्यम से समाजसेवा कर चुके हैं। दसवें महन्त भगवानदास तो राजस्थान आयुर्वेदिक चिकित्सा इकाई के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

इसके अतिरिक्त मन्दिर में शिक्षा, चिकित्सा तथा शारीरिक कौशल के प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलते रहे हैं। सातवीं पीढ़ी के महन्त रूपदास ने रावराजा लक्ष्मणदास की सेना में सहयोगी के रूप में सेवा देते हुए उन्हें नारनौल (हरियाणा) तक विजय पाने में सहयोग किया था।

प्पनिया अकाल में किया था जनसहयोग
प्राचीन लेखों में मिले प्रमाण बताते हैं कि उक्त मन्दिर के अधीन पूर्व में प्रचूर सम्पदा रही है। वर्ष 1956 में पड़े छप्पनिया अकाल के समय तत्कालीन महन्त भगवानदास ने नगर के सभी प्रमुख परिवारों को आर्थिक सहयोग दिया था जिसका आज भी प्रमाण विद्यमान है।

मंदिर में होते हैं ये आयोजन
महंत महावीरदास के अनुसार हनुमान चालीसा, स्वाध्याय, जागरण, अखण्ड रामायण, रामधुन आदि धार्मिक प्रकल्प तो मन्दिर में लगातार होते हैं। प्रत्येक शनिवार को हनुमान चालीसा के एकादश पाठ तथा मंगलवार, शनिवार व पूर्णिमा को सस्वर सुन्दरकाण्ड पाठ होते हैं। हनुमान जयंती, दशहरा, अन्नकूट, रामनवमी, कृष्ण-जन्माष्टमी तथा शरद-पूर्णिमा पर मन्दिर में विशेष आयोजन होते हैं। मन्दिर में शुद्ध घृत की तीन-तीन अखण्ड ज्योतियां निरन्तर प्रदीप्त रहती है।

vishwanath saini Desk
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