scriptMuslims decorate the palanquin and dress of Lord Narasimha | सद्‌भाव की मिसाल: मुस्लिम सजाते हैं नृसिंह भगवान की पालकी व पोशाक | Patrika News

सद्‌भाव की मिसाल: मुस्लिम सजाते हैं नृसिंह भगवान की पालकी व पोशाक

मूंडरू में नृसिंह लीला का मंचन आज

सीकर

Updated: May 10, 2022 03:13:04 pm

मूंडरू. लोक आस्था के प्रतीक भगवान नृसिंहजी की लीला का आयोजन मंगलवार को धूमधाम से होगा। कोविड के चले तीन साल बाद हो रहे इस आयोजन को लेकर लोगों में काफी उत्साह है। कौमी एकता व सदभाव की मिसाल इस लीला महोत्सव का आयोजन चार सौ साल से हो रहा है। संवत 1616में बसे गांव में लीला महोत्सव कोलड़ी चौक में होता है। इसमें सर्वसमाज के लोग शामिल होते हैं। देशभर में बसे प्रवासी भी नृसिंह लीला में शामिल होने के लिए आते हैं।

सद्‌भाव की मिसाल: मुस्लिम सजाते हैं नृसिंह भगवान की पालकी व पोशाक
सद्‌भाव की मिसाल: मुस्लिम सजाते हैं नृसिंह भगवान की पालकी व पोशाक

सौहार्द की मिसाल है लीला

सामाजिक सदभाव की प्रतीक लीला में मुस्लिम समाज के लोग उत्साह से भागीदारी निभाते हैं। वे नृसिंहजी की पालकी सजाते हैं और सरकंडों से परशुरामजी के अस्त्र-शस्त्रों को बनाते हैं।

मोहम्मद सफी परशुरामजी के अस्त्र-शस्त्रों तथा नबी मोहम्मद नृसिंहजी की पोशाके तैयार करते है। सैन समाज के लोगों की ओर से मशाल जलाए रखने के एवज में सवा किलो मीठा तेल देने की परम्परा है। दर्जी समाज लीला की पोशाकें, जांगिड़ समाज लकड़ी के घोड़े, पालकी तैयार करते हैं। छीतमका ब्राह्मण परिवार लीला के मुख्य पात्रों की भूमिका अदा करता है। पारीक परिवार पर राम- लक्ष्मण का रोल अदा करने वाले पात्रों को सजाने की जिम्मेदारी है। राजपूत समाज लीला महोत्सव की व्यवस्थाएं व सुरक्षा का कार्य करता रहा है।

ये है मूल परंपरा

लीला का मंचन बैसाख सुदी जानकी नवमी को होता है। नाथूसर की नदी के तट पर बसे छीतमका ब्राह्मण परिवार यहां जानकी नाथ के मंदिर में जानकी नवमी को लीला करने आते थे। तत्कालीन ठाकुर साब के भगवान नृसिंहजी का इष्ट था। उन्होंने हसामपुर से नृसिंह का चेहरा मंगवाकर नृसिंह मंदिर में स्थापित कराया तथा छीतमका ब्राह्मण परिवार को बसाकर पूजा की जिम्मेदारी सौंपी। तब से जानकी जन्मोत्सव को नृसिंह लीला के रूप में मनाया जाता है।

ये भी है परंपरा

नृसिंह मंदिर स्थित नृसिंहजी के तीनों चेहरों की अनूठी मान्यताएं है । 150 साल पहले तक मंदिर स्थित मुख्य चेहरे मुख्य चेहरे से लीला का मंचन होता था। बाद में 150 सालों से मंदिर में ही स्थापित कर रखा है। लीला के दिन अन्य दो चेहरों को ही मंदिर से बाहर निकाला जाता है। बैसाख सुदी एकादसी तिथि को कंचनपुर व चतुर्दशी को हसामपुर में होने वाली नृसिंह लीला में मूंडरू से भगवान नृसिंहजी के चेहरे पहुंचने के बाद ही लीला का मंचन शुरू होता है। हथौरा, बिलांदरपुर व हसामपुर पहुंचने पर चेहरों की पूजा- अर्चना कर स्वागत किया जाता है। नृसिंहजी के चेहरों ग्रामीण बैंड बाजे के साथ कस्बे की सीमा क्षेत्र के बाहर तक पहुंचाकर आते हैं। इसके बाद वाहनों से चेहरों को हसामपुर व कंचनपुर पहुंचाया जाता है। लीला के दिन सुबह नृसिंहजी की पालकी सजाकर नगर भ्रमण कराया जाता है। लोग घर पहुंचने पर खीर-चूरमा का भोग लगाकर पूजा अर्चना कर मन्नतें मांगते हैं। शाम के समय शुरू होने वाली नृसिंह लीला का मूकाभिनय मंचन रातभर चलेगा । रथयात्रा के रूप में भगवान विष्णु के 24 अवतारों की झांकी सजाई सहित मंच पर 24 अवतारों के मुखोटे धारण कर के नृत्य शैली में रातभर नृसिंह भगवान की लीला का मंचन होता है। प्रात:काल में भगवान नृसिंह का प्राकटय होता है एवं नगर दर्शन कर भक्तों को आशीर्वाद दिया जाता है।

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