कविता: आज मैं घर से निकली

कविता: आज मैं घर से निकली

By: Sachin

Updated: 30 Sep 2020, 06:51 PM IST

आज मैं घर से निकली मम्मी पापा को बताकर
पर्स में चाकू रखकर और मुंह छुपाकर
क्योंकि डर था कोई अनहोनी ना हो जाए
जिस सूरत को मैं संवारती हूं वह घिनौनी ना हो जाए
दूसरों से नफरत तो बहुत करते हैं कहीं खुद से नफरत ना हो जाए
मैं तो बस काम पर निकली थी कहीं मेरी हत्या ना हो जाए
गुनाह कोई और करता है और भुगतना किसी और को पड़ता है
और इसकी एक ही वजह है कि एक लड़की है और दूसरा लड़का है!

आजीवन कारावास से गुनाह कम नहीं हो जाएंगे
तुम दो को अंदर डालो बाहर 10 और बन जाएंग
े दिवाली पर पटाखे जलते हैं तो विवाद खड़े हो जाते हैं
पर जब देश की बेटी जलती है तो सब शांत क्यों हो जाते हैं?
औरतों को एक खिलौना समझ रखा है
खेल लिया और उजड़़ गया तो दूसरा ले लिया
लानत है उन लोगों पर जो भीड़ में भी आवाज नहीं उठाते हैं
े सब कुछ हो जाने के बाद केवल मोमबत्तियां जलाते हैं
पर एक बात याद रखना, जब वो आवाज उठाएगी, पूरी आवाम कांपेगी
जब वो चुप्पी तोड़ेगी, तो सबकी रुह कांपेगी
कहने दो जिसे जो कहना है, अब वह सारी हदें लांघेगी
इस देश की हर बेटी अब उस सोच को संवारेगी
इन सभी के जिम्मेदार वही लोग हैं जो बेटों के लिए मरते हैं
पर वे नहीं जानते कि बेटे ही यह करते हैं!
कोमल चौधरी, राधाकिशनपुरा, सीकर

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