कविता: इक मां के हैं बहुत बेटे

इक मां के हैं बहुत बेटे
बस एक ही बेटी है हिन्दी

By: Sachin

Published: 23 Sep 2020, 04:55 PM IST

इक मां के हैं बहुत बेटे
बस एक ही बेटी है हिन्दी
वो नाजों से पली बढ़ी
सुसंस्कृति साथ निखर चली
इक दिन इक लड़की सकुचाई
द्बार मां संस्कृति के आई
मां मुझे भी अपनी शरण में लो
कुछ दुख मेरे भी मां हर लो
मां थी सबकी मना कर न सकी
आंचल में अपने शरण भी दी
वो बेटी अंग्रेजी कहलाई
मुंहबोली बन कर इठलाई
भाईयों को बना लिया अपना
पूरा मुझसे ही हर सपना
हिंदी को उसने पीछे छोड़ा
मुख पृष्ठभूमि से भी मोड़ा
अब हर तरफ अंग्रेजी छाई
वो भाईयों से नाता तोड़ आई
बोली तुम भाई हिंदी के
मेरी होड़ कहां करते
अब भाई शर्मशार हुए
अपने अस्तित्व को निकले
बोले मां हमसे भूल हुई
नादान थे पथ पर थे भटके
मां तुम हो विशाल हृदय
हमारा फिर से करो विलय
हम हिस्सा हैं तेरी संस्कृति का
सर्वधर्म भूला बैठे थे अपना
हिंदी फिर से मुस्कराई
भाईयों के शिकवे भूल आई
हंसते भाई सब बोल पड़े
स्वाभिमान हमारा हैं हिन्दी
अभिमान हमारा हैं हिन्दी
हिंदी -हिन्दू - हिंदुस्तान
हिंदी ने रखा अंग्रेजी का भी मान
हिन्दी से सुसंस्कृत होकर
अब महक रहा हिन्दुस्तान
मेरी हिन्दी मेरा अभिमान


रचना: ममता वशिष्ठ,सीकर

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