कविता: ये राजनीति!

कविता: ये राजनीति!

By: Sachin

Published: 18 Sep 2020, 01:42 PM IST

काश! ये राजनीति न हो!
नीति न सही अनीति न हो!
भाई-भाई को लड़वाए
सिर फुड़वाए
प्रेम के बंधन नित तुड़वाए!
वैर बढ़ाए मन को मन से दूर कराए
घर-घर कलह का राज कराए!
सच को मरवा झूठ चलाए
सूखे गीले साथ जलाए!
सदियों-सदियों बात चलाए
मतलब-मतलब खेल खिलाए!
जयचंदों का साथ निभाए
अपना कोई दिख न पाए!
ये लालच और कुचाल जाल है
भोले जनों की उतरती खाल है!
मानवता होती हलाल है
दानवता करती धमाल है!
जन मानस का बड़ा सवाल है
शेष नहीं कुछ बस मलाल है!
चार दिनों में लाखों वादे
जीत बदलती तुरंत इरादे!
राजनीति है मतलब नीति
कौन सुनेगा अपनी बीती!
समझ किया गर मत का दान
"मौज" रहेगा कायम मान!


साया

हां!
देखा है मैंने
साया आदमी का!
नहीं रहा वो आदमी
जो सबको अपना मानता
सुख-दुख बांटता और
हर पल रहता तैयार
सबकी मदद करने को!
मानवता की जलती
मशाल लिए घूमता था
इस गली से उस गली
गांव-गांव, शहर-शहर!
सबको बांटता उजाले
खुशियां और उम्मीदें
बिना भेदभाव के
बिना हिसाब के
सबको पर्याप्त....
सब संतुष्ट.....
क्योंकि विश्वास था
न छल था न कपट!
तभी तो युग भी
सतयुग हुआ!
सुख में साथ सब
दुःख में हर मुख से दुआ!
अकल्पनीय है आज
मगर सचमुच था आदमी!
ये निर्विकार!भाव शून्य!
पुतला है!? नहीं है आदमी!
हां कभी-कभी
मौज जहां-तहां
नजर आता है
कोई साया आदमी का!

रचना: विमला महरिया "मौज"
सीकर, राजस्थान

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