कविता: मैं कौन हूं

मैं कौन हूँ ये बार बार पूछा जाता है,
मेरे वजूद का सुबूत हर बार मांगा जाता है |

By: Sachin

Updated: 29 Sep 2020, 07:04 PM IST

मैं कौन हूँ ये बार बार पूछा जाता है,
मेरे वजूद का सुबूत हर बार मांगा जाता है |
मौजूदगी का प्रमाण नतमस्तक होकर दूँ,
कुंठित साँचो में ढाला जाता है |
न जाने कब तक सह पाऊं मैं घाव अंतर्मन के,
आंगन अब झुलस रहा है बिना चमन के |
छुपा भी लूं अश्रु अपने छुपाऊँ कैसे उदासी को,
अपने ही घर मेहमान हूँ जैसे रखते हैं प्रवासी को |
हक़दार नहीं क्या अपने ही अधिकारों की मैं ,
बोल पडूँ तो प्रश्न यही , नहीं संस्कारों की मैं |
चाहूँ मन भर उड़ना उस आजाद से आसमान में ,
कुछ क्यारी मेरी भी हो इस समतल से मैदान में |
तुम चाहो तो आकर सुनो क्या है हलचल मची,
वो मूरत मूर्त सी है क्यों जो थी चंचल सी |
मालूमात करोगे तो कड़ियाँ जान पाओगे,
मेरी बग़ावत की बुनियाद पहचान जाओगे |
लौट आओगे पास मेरे तो सीने से लगा लुंगी,
मत चिंता करना मैं तुम्हारी सब बदतमीज़ी भूला दूंगी|
पर ये न हो पायेगा अब के आत्मसम्मान को खो दूँ,
जो पाया है मिन्नतों से उसे यूँही जमीं में बो दूँ |
चाहे जो कहलो "मैं आवारा हूँ बर्बाद हूँ" ,
मैं जानती हूं सही मायने मेरे मैं अब आज़ाद हूँ।

राहुल गुप्ता, सीकर

राजस्थान पत्रिका लाइव टीवी

हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned