scriptPradeep is raising three brothers by leaving studies and wages | Human Story. बचपन में उठा मां- बाप का साया, पढ़ाई छोड़ मजदूरी से तीन भाइयों को पाल रहा प्रदीप | Patrika News

Human Story. बचपन में उठा मां- बाप का साया, पढ़ाई छोड़ मजदूरी से तीन भाइयों को पाल रहा प्रदीप

प्रमोद स्वामी
सीकर/खाटूश्यामजी. वह होनहार व हौसलामंद था। आंखों में सुनहरे ख्वाब व जहन में देश सेवा का जज्बा था।

सीकर

Published: July 20, 2022 03:03:26 pm

सीकर/खाटूश्यामजी. वह होनहार व हौसलामंद था। आंखों में सुनहरे ख्वाब व जहन में देश सेवा का जज्बा था। पर काल ने एक साल में ही उससे माता- पिता छीन ऐसी कुचाल चली कि अपने मासूम भाई बहनों की पेट भराई व पढ़ाई के लिए उसे अपनी जिंदगी मजदूरी में झोंकनी पड़ रही है। यह दुखभरी दास्तां दांतारामगढ उपखंड के लिखमा का बास गांव निवासी 19 वर्षीय प्रदीप वर्मा की है। जिसने कभी पढ़ लिखकर देश सेवा के लिए सेना में जाने का सपना पाला था। पर करीब डेढ साल पहले अचानक मां मंजू देवी और उसके 8 महीने बाद ही पिता गोमाराम वर्मा की बीमारी से मौत के बाद उसके सारे अरमान आंसुओं में बह गए। प्रदीप को तीन छोटे भाई संदीप, जयदीप व घनश्याम पालन व पढ़ाई के लिए मजबूर होकर मजदूरी करनी पड़ रही है।

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अब भाइयों को बनाना चाहता है सैनिक
प्रदीप का सेना में जाने का सपना कुदरत ने कुचल दिया। पर अब वह अपने भाइयों सेना में भेजना चाहता है। इसके लिए वह मेहनत- मजदूरी कर उन्हें पढ़ा रहा है। प्रदीप का कहना है कि वह खुद तो परिस्थितियों के चलते नहीं पढ़ पाया लेकिन भाइयों को पढ़ाकर उन्हें देश सेवा के लिए सेना में जरूर भेजेगा। इसके लिए उसे कितनी ही मेहनत क्यों ना करनी पड़े। प्रदीप का भाई संदीप 11वीं, जयदीप 9वीं व घनश्याम छठीं कक्षा में पढ़ रहे हैं।

भाई मिलकर बनाते हैं खाना
प्रदीप ने बताया कि मां-बाप के गुजर जाने के बाद सबसे बड़ी समस्या खाने की आई। हमें खाना बनाना नहीं आता था। मगर मजबूरी सब सिखा देती है। जैसे- तैसे करके खाना बनाना सीखा। प्रदीप बताता है कि मजदूरी पर जाने से पहले वह खाना बनाकर छोटे भाईयों को खिलाता था। हालांकि अब छोटे भाई भी इसमें सहयोग करने लगे हैं। काम पर जाने से पहले वह उसका टिफिन तैयार करके देते है।

मजदूरी नहीं पड़ रही पूरी, सहयोग की दरकार
प्रदीप ने बताया कि वह मजदूरी में जितना कमाता है, वो परिवार के लिए पूरा नहीं पड़ रहा। भाइयों की पढ़ाई व भरण- पोषण के लिए शासन- प्रशासन से मदद मिले तो ही उसके सपनों को पंख लग सकते हैं। बकौल प्रदीप वह खुद को अपने सपने पूरे नहीं कर पाया लेकिन भाइयों को पढ़ा- लिखाकर बड़ा आदमी बनाना चाहता है। जिसके लिए उसे मदद की दरकार है।

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