एक वचन निभाने के लिए इस राजपूत राजा ने लगा दी थी जान की बाजी, 17 मौत के बाद भी नहीं टेके घुटने

एक वचन निभाने के लिए इस राजपूत राजा ने लगा दी थी जान की बाजी, 17 मौत के बाद भी नहीं टेके घुटने

Naveen Parmuwal | Publish: Jun, 20 2019 02:12:38 PM (IST) | Updated: Jun, 20 2019 02:24:46 PM (IST) Sikar, Sikar, Rajasthan, India

Rao Raja kalyan Singh Jayanti: आज सीकर को आधुनिक रूप देने वाले तत्कालीन राव राजा की 133वीं जयंती है।

सीकर.
Rao Raja Kalyan Singh Jayanti: राजस्थान का सीकर जिला जो कभी बीरभान का बास नाम से पुकारा जाता था। आज Sikar को शिक्षानगरी ( Education Hub ) के रूप में जाना जाता है। आज सीकर को आधुनिक रूप देने वाले तत्कालीन राव राजा की 133वीं जयंती है। इतिहासकारों से कल्याण सिंह के बारे में जानने को बहुत कुछ मिलता है, जो युवा पीढ़ी शायद ही जानती हो। पत्रिका ने सीकर संग्रहालय, इतिहासकरों से उनके बारे में कुछ ऐसी ही जानकारी एकत्रित की है। वे अपने वचन के इतने पक्के थे कि बेटे की शादी के लिए दिया वचन निभाने के लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा।

Rao Raja kalyan Singh Jayanti: आज सीकर को आधुनिक रूप देने वाले तत्कालीन राव राजा की 133वीं जयंती है।

वर्ष 1933 में कल्याण सिंह के बेटे राजकुमार हरदयाल सिंह की सगाई ध्रांगध्रा ( काठियावाड़) की राजकुमारी के साथ हुई थी। लेकिन, सगाई इस शर्त पर हुई कि राजकुमार विवाह से पहले विदेश नहीं जाएंगे। सन् 1938, 11 फरवरी को कल्याण सिंह को पता चला कि जयपुर के सवाई मानसिंह उनके बेटे हरदयाल सिंह ( Hardayal Singh ) को मई में अपने साथ इंग्लैंड ले जाएंगे। इस बात पर राजा कल्याण सिंह सहमत नहीं हुए और इसकी अनुमति नहीं दी। बावजूद इसके कैप्टन वेब हरदयाल सिंह को परीक्षा समाप्ति से पहले ही अजमेर के मेयो कॉलेज से निकालकर जयपुर ले गए। इसी बात को लेकर सवाई मानसिंह और रावराजा में दूरियां बढ़ गई।

Rao Raja kalyan Singh Jayanti: आज सीकर को आधुनिक रूप देने वाले तत्कालीन राव राजा की 133वीं जयंती है।

इतिहासकारों के अनुसार जयपुर के सवाई मानसिंह ( Sawai Mansingh Jaipur) सीकर के राजा कल्याण सिंह को कई बार जयपुर बुलाया। लेकिन, वह हर बार किसी ने किसी कारण टालते रहे। इसके बाद जयपुर के इंस्पेक्टर जनरल पुलिस यंग सीकर पहुंच कर कल्याण सिंह से वार्ता के दौरान देवीपुरा कोठी से उनको गिरफ्तार करने की कोशिश की। लेकिन, कल्याण सिंह सुरक्षित वापस गढ़ तक पहुंचने में सफल रहे। इसके बाद स्थिति युद्ध वाली बन गई। उनकी रक्षा के लिए प्रमुख जागीरदारों सहित लगभग 30 हजार राजपूत भी सीकर पहुंचे। सीकर शहर के दरवाजे बंद कर दिए गए और हड़ताल की घोषणा कर दी गई। फतेहपुर, लक्ष्मणगढ़ और रामगढ़ में भी इस हड़ताल का अनुसरण किया गया। जयपुर प्रशासन किसी भी कीमत पर कल्याण सिंह को जयपुर बुलाना चाहता था किन्तु राव राजा नहीं जाना चाहते थे।

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हड़ताल की घोषणा

कल्याण सिंह पर अत्याचार के विरोध में सीकर के लोगों ने एक कमेटी बनाते हुए सीकर में हड़ताल की घोषणा कर दी। दस मई को महात्मा गांधी की पत्नी कस्तूरबा गांधी भी रानी साहिबा से मिलने के लिए सीकर आई। पांच जुलाई को श्रीमाधोपुर तहसील के ग्राम महरोली, मऊ, मुण्डरू, बागरियावास, दिवराला व लिसाडिय़ा के सशस्त्र राजपूत मदद के लिए सीकर रेलवे स्टेशन पर पहुँचे। जयपुर पुलिस ने इन लोगों को हथियार रख देने तथा लौटने के लिए कहा गया। इंकार करने पर जयपुर पुलिस ने गोलीबारी शुरू कर दी। इसमें 17 से अधिक लोगों की मौत हो गई और कई घायल हो गए। 19 जुलाई 1938 के कई समाचार पत्रों में छपा कि 'सीकर स्टेशन पर जो हत्याकाण्ड हुआ था, उसके बारे में अब पब्लिक कमेटी को ज्यादा सही हालात मालूम हुए हैं।

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बजाज और मदनसिंह के प्रयास से समझौता
जमनानलाल बजाज और नवलगढ़ के मदनसिंह की मध्यस्थता के बाद दोनों पक्षों में समझौता हुआ। राजपरिवार के लोगों ने सीकर की चारदीवारी के प्रवेश द्वार खोल दिए और 23 जुलाई को सवाई मानसिंह जयपुर से हरदयाल सिंह को लेकर सीकर पहुंचे।

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