scriptSports department is not respecting players in other departments | दूसरे महकमों में खिलाडिय़ों का मान, खेल विभाग नहीं कर रहा सम्मान | Patrika News

दूसरे महकमों में खिलाडिय़ों का मान, खेल विभाग नहीं कर रहा सम्मान

प्रदेश में खिलाडिय़ों को तराशकर तमगा दिलाने का सपना दिखाने वाले खेल विभाग की जमीनी हकीकत कुछ अलग है।

सीकर

Published: April 11, 2022 10:50:40 am

सीकर. प्रदेश में खिलाडिय़ों को तराशकर तमगा दिलाने का सपना दिखाने वाले खेल विभाग की जमीनी हकीकत कुछ अलग है। प्रदेश में लगातार खेल प्रशिक्षकों की कमी के बाद भी विभाग ने स्थायी भर्तियों से सोशल डिस्टेंस बनाया हुआ है। हर साल प्रदेश में संविदा से अल्पकालीन प्रशिक्षकों की भर्ती की जा रही है। प्रदेश में आखिरी बार स्थायी भर्ती वर्ष 2012 में हुई थी। इस दौरान महज 68 खेल प्रशिक्षकों को ही नियुक्ति मिली थी। हालत यह है कि प्रदेश में 22 जिलों में तो खेल अधिकारियों का चार्ज ही कार्यवाहकों के भरोसे है। जबकि खेल प्रशिक्षकों की बात करें तो 148 पद स्वीकृत है। इनमें से महज 83 पदों पर ही प्रशिक्षक कार्यरत हैं। जबकि 65 प्रशिक्षकों के पद खाली है। दूसरी तरफ प्रदेश में संविदा पर कार्यरत 250 प्रशिक्षकों को पांच से दस महीने का वेतन नहीं मिला है। अब फिर से सभी जिलों में नए संविदा प्रशिक्षकों को लगाने की तैयारी की जा रही है। इसको लेकर खेल प्रशिक्षकों में विरोध भी बढ़ रहा है। खेल प्रशिक्षकों का कहना है कि सांई के सेंटरों के मुकाबले राजस्थान में खेल प्रशिक्षकों को काफी कम वेतन-भत्ते दिए जा रहे हैं। खिलाडिय़ों का कहना है कि वर्ष 1992 में सरकार ने निर्णय लिया था कि सभी जिलों में पांच-पांच खेलों के कोच लगाए जाएंगे। अब हाल यह है कि किसी जिले में एक तो किसी जिले में तीन ही स्थायी खेल प्रशिक्षक है।

दूसरे महकमों में खिलाडिय़ों का मान, खेल विभाग नहीं कर रहा सम्मान
दूसरे महकमों में खिलाडिय़ों का मान, खेल विभाग नहीं कर रहा सम्मान


पहले पाइका के जरिए लगाए थे कोच
वर्ष 2012 की भर्ती के बाद प्रदेश में पहले पाइका योजना के तहत ग्राम पंचायत स्तर तक भी कोच लगाए गए। किसी जिले में आठ तो किसी जिले में दस महीने बाद ही इन्हें मानदेय देना बंद कर दिया गया। इसके बाद से लगातार हर साल संविदा के तौर पर प्रशिक्षक लगाए जाते हैं। प्रदेश में फिलहाल 250 से ज्यादा संविदा प्रशिक्षक कार्यरत हैं।

प्रदेश के खिलाडिय़ों का दर्द, ब्लॉकों में कोई इंतजाम नहीं

केस एक: निजी एकेडमी में जाने पर मजबूर
सीकर निवासी खिलाड़ी सुधीर जैन का कहना है कि वह क्रिकेट में भविष्य बनाना चाहता है। कई बार वह जिला खेलकूद प्रशिक्षण केन्द्र गया। लेकिन कोचिंग की कोई सुविधा नहीं मिली। इस पर मजबूरी में निजी एकेडमी की शरण लेनी पड़ी।

केस दो: मैदान बना दिए, कोच नहीं
प्रदेश के 90 से अधिक ब्लॉकों में खेल विभाग ने मैदान तैयार करवा दिए, लेकिन अभी तक कोच नहीं लगे। कई जिलों में स्टेडियमों का ताला खोलने के लिए भी खेल विभाग का कोई कर्मचारी नहीं है।

केस तीन: दूसरे विभाग में खेल कोटे में नौकरी, यहां दूरी
खिलाडिय़ों का दर्द है कि प्रदेश के सभी विभागों में खेल कोटे में नौकरी दी जा रही है। जबकि खुद खेल विभाग की ओर से पदक विजेता खिलाडिय़ों को आउट ऑफ टर्न नौकरी दी जा सकती है। पहले विभाग की ओर से लिम्बाराम को सीधे खेल अधिकारी व कई खिलाडिय़ों को प्रथम श्रेणी कोच नियुक्त किया गया था।

विभाग का तर्क: पहले होगी डीपीसी, फिर नई भर्ती

राजस्थान राज्य क्रीड़ा परिषद की अध्यक्ष व विधायक कृष्णा पूनिया भी मान चुकी है कि प्रदेश में खिलाडिय़ों की आवश्यकता के हिसाब से खेल प्रशिक्षक नहीं है। इस मामले में पिछले दिनों उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा था कि पहले कार्यरत खेल प्रशिक्षकों की डीपीसी कराई जाएगी। इसके बाद रिक्त रहे पदों के आधार पर प्रदेश में नई भर्ती कराई जाएगी। हालांकि परिषद की ओर से अभी तक डीपीसी का कलैण्डर भी घोषित नहीं हुआ है।


बिना कोच कैसे तैयार होंगे खिलाड़ी
सरकार को खिलाडिय़ों को तराशने के लिए स्थायी भर्ती करनी चाहिए। संविदा की भर्तियों से राजस्थान के खिलाडिय़ों का भला नहीं होने वाला है। पिछले दस साल से स्थायी भर्ती की मांग गूंज रही है।

गजेन्द्र सिंह राठौड़, प्रदेश अध्यक्ष, अखिल राजस्थान राज्य कर्मचारी महासंघ खेल परिषद


खिलाडिय़ों के अनुपात में लगे कोच
वर्तमान में खिलाडिय़ों और प्रशिक्षकों का अनुपात बिगड़ा हुआ है। जहां आवश्यकता है वहां स्थायी व अस्थाई कोच के पद खाली है। सरकार को सभी जिलों में पहले यह पता लगाना चाहिए कि वहां किस खेल के खिलाड़ी सबसे ज्यादा है। इसके आधार पर जिलों में प्रशिक्षक नियुक्त किए जाने चाहिए।

विजेन्द्र पचार, खेल एकेडमी संचालक, सीकर

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