पहले खुद के जीवन को किया रोशन, अब दूसरों को दे रहे उजाला

दृष्टिबाधित मनीष ने बुलंद हौसले से मुश्किलों पर हासिल की जीत...

By: Ajeet shukla

Updated: 27 Nov 2019, 12:40 PM IST

सिंगरौली. सच ही कहा गया है कि मन के हारे हार और मन के जीते जीत। मन में सफल होने का जज्बा हो और उसके लिए इमानदार कोशिश की जाए तो यह तय है कि सफलता कदम चूमेगी। सिंगरौली के दृष्टिबाधित मनीष चौरसिया ने अपने बुलंद हौसले से सफलता हासिल कर इस कहावत को चरितार्थ किया है।

वर्तमान में मनीष न केवल एक स्कूल के संचालक हैं बल्कि युवाओं को मोटर मैकेनिक का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं। बचपन से दृष्टि की समस्या से ग्रसित मनीष के आंखों की ज्योति कक्षा पांचवीं तक पहुंचते-पहुंचते 90 प्रतिशत चली गई। दुर्भाग्य की बात यह है कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से ताल्लुक रखने वाले मनीष के तीन सगे भाई भी दृष्टिहीनता के शिकार हैं। उनके पिता परिवार का पालन-पोषण बड़ी मुश्किल से कर रहे थे।

ऐसे में मनीष ने हिम्मत बढ़ाई और 11 वर्ष की उम्र में ऑटो पाटर््स और सर्विस सेंटर में काम करने का तकनीकी कौशल हासिल कर लिया। तकनीकी कौशल प्राप्त करने के बाद उन्होंने न केवल खुद अपना कार्य शुरू किया। बल्कि दूसरे युवाओं को भी प्रशिक्षण देने लगे। जब जेब में कुछ आमदनी आने लगी तो मनीष का हौसला और बुलंद हुआ। उनके जैसे बच्चों के जीवन में छाए अंधेरे को मिटाने के लिए उन्होंने बैढऩ में दृष्टिबाधित बच्चों के लिए एक स्कूल खोल दिया।

मनीष के साहसपूर्ण प्रयास का अब नतीजा यह है कि स्कूल को प्राइवेट आइटीआइ कॉलेज से संबद्धता मिल गई है। ऐसे में मनीष के साथ उन दृष्टिबाधित बच्चों का जीवन उज्ज्वल नजर आ रहा है, जो स्कूल में पढ़ते हैं। मनीष खुद की तरह अपने भाईयों में भी इस बात का जोश भर रहे हैं कि उठो और आगे बढ़ो, सफलता इंतजार कर रही है।

मनीष को उद्योग विभाग ने उपलब्ध कराया ऋण
मनीष सफल कोशिश से प्रेरित होकर उन्हें दृष्टिबाधितों के लिए और बेहतर करने के उद्देश्य से उद्योग विभाग ने 15 लाख रुपए का ऋण दिलाया है।मनीष की योजना है कि ऋण के रूप में मिले इस बजट से वह स्कूल में बस सहित अन्य तकनीकी सुविधाएं मुहैया कराएंगे। उनकी कोशिश यह है कि क्षेत्र का हर दृष्टिबाधित खुद के पैरों पर खड़ा हो।किसी और पर बोझ नहीं बने। ताकि दृष्टिबाधितों को कोई माता-पिता या समाज पर बोझ नहीं समझे।

Ajeet shukla Reporting
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