पशुपालन विभाग: अविका को नहीं मिला कवच

जिले में लक्ष्य के मुताबिक भेड़ों का ४ फीसदी भी बीमा नहीं कर पाया विभाग...

By: mahesh parbat

Published: 13 Mar 2018, 10:06 AM IST

सिरोही. जिलेभर के पशुपालकों को आर्थिक सम्बल व प्रोत्साहित करने के लिए पशुपालन विभाग ने अविका कवच बीमा योजना शुरू की थी। लेकिन योजना कागजों में दम तोड़ रही है। विभागीय कर्मचारियों की ओर से योजना का प्रसार-प्रचार नहीं करने पशुपालकों को कोईफायदा नहीं मिल रहा है। दरअसल, जिले में २ लाख ८९ हजार २९४ भेड़ है। लेकिन विभाग की ओर से पशुपालकों को अनुदान राशि के अनुरूप ३ हजार भेड़ों का बीमा करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था, लेकिन विभागीय अधिकारी इस लक्ष्य को भी पूरा नहीं कर पाए। हाल यह है कि विभाग की ओर से महज १२० भेड़ों का ही बीमा किया गया है। जबकि, वित्तीय वर्ष-२०१७-१८ अब पूरा होने को हैं। ऐसे में जाहिर है कि लक्ष्य के अनुरूप भेड़ों का बीमा कवर नहीं हो पाएगा।

ऐसे मिलेगा क्लेम
बीमित भेड़ की मृत्यु हो जाने की दशा में भेड़पालक को बीमा कंपनी के अधिकृत कार्यालय, प्रतिनिधि एवं सम्बंधित जिले के संयुक्त निदेशक से सम्पर्क कर भेड़ की मृत्यु होने के छह घंटे के अन्दर सूचित करना होना अनिवार्य होता है। इसके बाद में अन्य कार्रवाई की जाती है।
यह हैं पात्रता
योजना का लाभ लेने के लिए समस्त भेड़ पालकों के पास भामाशाह कार्डहोना जरूरी है।
बीमित की जाने वाली भेड़ किसी अन्य योजना के अंतर्गत बीमित नहीं होनी चाहिए।
भेड़ की एक यूनिट में दस पशु मानते हुए एक परिवार की कुल ५० भेड़ों का बीमा अनुदानित प्रीमियम पर किया जाएगा।
अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, बीपीएल श्रेणी के भेड़पालक को ८० प्रतिशत एवं सामान्य श्रेणी के भेड़पालक को ७० प्रतिशत अनुदानित बीमा के लिए भेड़ यूनिट की अधिकतम कीमत ५० हजार रुपए होगी।
आवश्यक दस्तावेज
भेड़ का स्वास्थ्य प्रमाण-पत्र पशु चिकित्सकों की ओर से जारी होना चाहिए।
भेड़ के कान में टैग सहित भेड़पालक का फोटो
आधार कार्ड, बैंक डायरी की प्रतिलिपि, भेड़ पालक के हिस्से की प्रीमियम राशि
रोग व दुर्घटना से बीमित भेड़ की मृत्यु पर १०० प्रतिशत बीमा लाभ
&इस साल विभाग को तीन हजार भेड़ों का बीमा करवाने का लक्ष्य मिला था। इसमें १२० का बीमा कर दिया गया है।जिले के अधिकांश भेड़ माइग्रेट हो जाने से इस योजना का लाभ नहीं ले रहे हैं। समय-समय पर भेड़पालकों को इस योजना की जानकारी देते हैं।
डॉ. जगदीश बरबड़, संयुक्त पशुपालन विभाग, सिरोही

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