scriptTender not done to distribute electricity bill under the guise of Coro | कोरोना की आड़ में बिजली बिल बांटने का टेन्डर किया नहीं, कर्मचारियों के गले में घंटी बांधने का खामियाजा भुगत रहे हैं उपभोक्ता | Patrika News

कोरोना की आड़ में बिजली बिल बांटने का टेन्डर किया नहीं, कर्मचारियों के गले में घंटी बांधने का खामियाजा भुगत रहे हैं उपभोक्ता

ग्राहकों को आर्थिक झटका देने में डिस्कॉम की है अजीबोगरीब दास्तां

सिरोही

Published: April 06, 2022 02:46:22 pm

तंवरी (सिरोही). कोरोना की आड़ में डिस्कॉम ने ग्रामीण इलाकों में बिजली के बिल बांटने का दो साल से ठेका ही नहीं किया। ठेका नहीं होने पर जब यह प्रश्न खड़ा हुआ कि आखिरकार बिल कौन बांटे, तो डिस्कॉम के हुक्मरानों ने बिल बांटने की घंटी डिस्कॉम के लाइनमैन, सीसीयर सरीखे कर्मचारियों के गले में ही बांध दी। करीब दो साल से ये कर्मचारी गले में घंटी बांधे घूम रहे हैं, पर आला अफसरों को बिल वितरण के टेन्डर करवाने के बारे में सोचने की अभी तक फुर्सत ही नहीं मिली। दिलचस्प बात तो यह है कि लाइनमैन, सीसीयर सरीखे कर्मचारी भी घर-घर बिल पहुंचाने के बजाय ऑफिस से बिल ले जाकर, गांव में किसी किसी चाय की थड़ी या दुकान पर बिल का बंच पटक देते हैं, ताकि लोग अपना-अपना बिल खोजकर ले जा सकें।
कोरोना की आड़ में बिजली बिल बांटने का टेन्डर किया नहीं, कर्मचारियों के गले में घंटी बांधने का खामियाजा भुगत रहे हैं उपभोक्ता
कोरोना की आड़ में बिजली बिल बांटने का टेन्डर किया नहीं, कर्मचारियों के गले में घंटी बांधने का खामियाजा भुगत रहे हैं उपभोक्ता
बिल नहीं मिलने पर ऐसे लगता है आर्थिक झटके का करंट

अब होता यह है कि अधिकतर लोग तो उस चाय की थड़ी या दुकान से अपना-अपना बिल खोजकर ले जाते हैं, पर कई लोगों को इसका पता ही नहीं चल पाता कि गांव में बिल आए हैं और फलां जगह रखे हैं। कई घरों में पुरुष दिसावर होने से सिर्फ महिला या बुजुर्ग ही रहते होने से वे बिल आने का इंतजार करते रह जाते हैं और बिल के भुगतान की तिथि निकल जाती है। ऐसी सूरत में बाद में या तो बिल हाथ लग जाने या फिर बिल का पता लगाने उपभोक्ता एईएन या जेईन ऑफिस जाता है तब पता चलता है कि बिल भुगतान की तिथि तो निकल चुकी है। तब ग्राहक को विलम्ब शुल्क के साथ बिल का भुगतान करना उपभोक्ता की मजबूरी हो जाती है। मसलन उसे विलम्ब शुल्क के रूप में आर्थिक झटके का करंट सहना ही पड़ता है सिर्फ बिल समय पर उनके घर नहीं पहुंचने से। इसे डिस्कॉम की बलिहारी ही कहा जाएगा।
पांच सौ-सात सौ रुपए की रकम देना रहस्यमय

बताते हैं कि बड़े गांवों में बिजली के बिल जिस चाय की थड़ी या दुकान पर रखे जाते हैं, उन्हें बिल सम्भालकर रखने के पारिश्रमिक के तौर पर पांच सौ-सात सौ रुपए की रकम भी बिजली कर्मचारियों की तरफ से दी जाती है। यह रकम कहां से आती है और क्यों दी जाती है, यह भी रहस्य बना हुआ है। डिस्कॉम में तो ऐसा कोई प्रावधान है नहीं। जाहिर है यह राशि डिस्कॉम के वे कर्मचारी ही देते हैं जो ऑफिस से बिल ले आते हैं और गांव में चाय की थड़ी या दुकान वाले को थमा जाते हैं। ताकि वह बिल सम्भालकर रखें। लाइनमैन और सीसीयर तो हर घर को जानते तक नहीं तो फिर कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वे ये बिल प्रत्येक घर तक पहुंचा देंगे। ऐसी सूरत में वे यह सोचकर पांच सौ-सात सौ रुपए दे देते है कि चलो बला टली। पर, सवाल यह भी उठता है कि वे यह रकम अपनी तनख्वाह में से तो देते नहीं होंगे, तो वे इस रकम का जुगाड़ कैसे और कहां से करते होंगे, यह भी सोचने वाली बात है।
... कालन्द्री उपखंड में और भी कई समस्याएं

डिस्कॉम के कालन्द्री उपखंड में तो बिल वितरण के अलावा बिजली उपभोक्ताओं की और भी कई समस्याएं हैं, जिनका निराकरण आसान नहीं लगता। कई बार मीटर रीडिंग कर उपभोग के यूनिट जोड़े बिना ही बिल थमा दिए जाते हैं। कई बार उपभोक्ताओं को साल में दो-तीन बिल कम राशि के जारी कर दिए जाते हैं, ताकि बाद में ऑडिट फीस के नाम पर भारी भरकम रकम वसूल की जा सकें।
इनका कहना है ...

कालन्द्री उपखंड में दो साल से कोई टेन्डर नहीं हुआ। बिजली विभाग के कर्मचारी ही घर-घर बिल पहुंचाते हैं। मीटर की रीडिंग लाने के लिए बिजली विभाग से पांच कर्मचारी नियुक्त है। कभी मीटर खराब होने या लाइट नहीं होने की स्थिति में रीडिंग सही नहीं दिखाई देती, ऐसे में हम लम्प-सम्प राशि का प्रोविजनल बिल जारी कर देते हैं। जब हमारी ऑडिट आती है तो किसी उपभोक्ता का कम राशि का बिल देखकर उस पर ऑडिट फीस लगा देते हैं।
- ओमप्रकाश सीरवी, सहायक अभियंता, कालन्द्री

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