योगी सरकार के खिलाफ निकला प्रेरकों का गुस्सा, बोले उम्मीद के मुताबिक सरकार ने नहीं दिया सहारा

योगी सरकार के खिलाफ निकला प्रेरकों का गुस्सा, बोले उम्मीद के मुताबिक सरकार ने नहीं दिया सहारा
UP Sarkar

Shatrudhan Gupta | Updated: 04 Oct 2017, 10:52:17 PM (IST) Lucknow, Uttar Pradesh, India

सरकार से परमानेंट होने की उम्मीद लगाए प्रेरकों को 27 सितम्बर के सराकरी आदेश के बाद बड़ा झटका लगा है।

सीतापुर. सरकार से परमानेंट होने की उम्मीद लगाए प्रेरकों को 27 सितम्बर के सराकरी आदेश के बाद बड़ा झटका लगा है। 27 सितम्बर 2017 को निदेशक साक्षरता वैकल्पिक शिक्षा एवं सचिव राज्य साक्षरता मिशन प्राधिकरण के पद पर तैनात अवध नरेश शर्मा द्वारा जारी निर्देश आते ही प्रेरकों की संविदा समाप्त होने का मामला एकदम स्पष्ट हो गया। हालांकि यह पहले से तय था लेकिन प्रेरकों की उम्मीद फिर भी कायम थी। सरकार के फैसले के बाद सहारा लगाकर बैठे प्रेरकों की उम्मीदों पर पानी फिर चुका है। फिलहाल सरकार द्वारा योजना को आगे बढ़ाने की कोई मंशा नही है। इस सम्बंध में सभी जिलों के लोक शिक्षा सचिव को स्पष्ट लिखित निर्देश जारी कर दिया गया है।

आपको बताते चलें कि भारत में साक्षरता दर बढ़ाने के लिए राज्यो में प्रेरक तैनात किए गए थे। उत्तर प्रदेश में भी योजना के तहत प्रेरकों को संविदा पर नियुक्ति दी गई। इन प्रेरकों को महज दो हजार महीने का वेतन देकर लोगों को साक्षर बनाने का बीड़ा सौंप दिया गया। उत्तर प्रदेश में प्रेरकों के द्वारा अन्य ड्यूटियां भी कराई गईं जिनमें बी एल ओ , पल्स पोलियो आदि शामिल रहीं। प्रेरकों द्वारा निरक्षरों को खोजने और उन्हें शिक्षा के लिए प्रेरित करने की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ रही थी। प्रेरकों से बात करने पर पता चला कि इस कार्य में उन्हें पूरा पूरा दिन सर्वे करना पड़ा है। बावजूद इसके उनके वेतन में कोई इजाफा नही किया गया।

प्रेरक प्रेमकिशोर की मानें तो कॉपी पेन सहित अन्य बहुत से खर्चे उन्हें अपनी जेब से करने पड़ते थे। इतना सब होने के बावजूद प्रेरकों ने मानदेय समय से न मिलने की बात भी कही। प्रदेश के जिला सीतापुर के महोली ब्लॉक के प्रेरकों ने 18 माह से मानदेय न मिलने की बात भी कही। पूरे प्रदेश से प्रेरकों के कई माह के मानदेय रुके होने के समाचार सामने आ रहे हैं। फिलहाल प्रेरक इन विषम परिस्थितियों से जूझ रहे थे। प्रदेश के प्रेरकों की मानें तो उन्हें अपनी हक की बात कहने पर लाठियां मिलीं। प्रेरकों का सबसे बड़ा दर्द यह भी है कि उन्हें जिस सरकार से उम्मीद थी उसी ने वादा खिलाफी कर डाली। बातचीत के दौरान प्रेरकों ने 3 अप्रैल 2016 को झूले लाल पार्क में रैली की याद दिलाते हुए बताया कि इस रैली को अधिकार दिलाओ रैली नाम दिया था।

रैली में राजनाथ और अमित शाह पहुँचे थे। तमाम संविदा कर्मियों सहित प्रेरकों को अधिकार दिलाने की बात की गई थी। प्रेरकों के अनुसार रैली आयोजक ने यह भी कहा था कि जो प्रेरकों सहित तमाम संविदा कर्मियों की स्थायी नियुक्ति के सम्बंध में कदम उठाएगा वहीं उत्तर प्रदेश की गद्दी पर राज करेगा। ये रैलियां याद आते ही प्रेरक खुद को ठगा हुआ पा रहे हैं। जो अधिकार दिलाने की बात करते थे उनके ही राज में अधिकार छीन लिए गए। रोजगार देने की बात करने वाली सकरार ने लाखों की संख्या में इस फैसले से लोगों को एक झटके में बेरोजगार कर दिया। फिलहाल प्रेरक संविदा से भी पैदल हो चुके हैं। दो हजार पर भी काम करने वाले ये मेहनतकश अब इससे भी वंचित हो जाएंगे। आदेश जारी होने के बाद हमने कई प्रेरकों से सीधे संवाद के जरिये उनकी प्रतिक्रिया जानने की कोशिश की तो ऐसा लगा जैसे ताजे घाव को किसी ने उकेर दिया है। कोई अब भी मोदी से आश लगाए बैठा नजर आया तो कोई उधार के पैसों से न्याय की लड़ाई लड़ने की बात करते नजर आया।

प्रेरकों से संवाद के बाद एक बात सामने थी कि भले ही उन्हें उम्मीद हो या न हो लेकिन वह सरकारों पर खुद को छलने का सीधा आरोप मढ़ रहे थे। प्रेरक राघवेंद्र ने बताया कि सरकार बनने से पूर्व अधिकार दिलाओ अभियान और संविदा कर्मियों को नियमित करने का झूंठा वादा उन्हें हमेशा याद रहेगा। फिलहाल राघवेंद्र को अब भी सरकार से उम्मीद है और वह सरकार से आस लगाए बैठे हैं। प्रेरक गरिमा की माने तो अल्प वेतन पर दस से पाँच ड्यूटी कराकर अब बेरोजगार करना दुखभरा है। प्रेरक आदित्य के अनुसार रोजगार देने की बात करने वाली सरकार रोजगार कैसे छीन सकती है। प्रेरक प्रतिमा बताती हैं यह प्रेरकों के साथ अन्याय है सरकार जरूर फिर से विचार करेगी और मीडिया हम लोगों के लिए बात उठा रही है जिससे सरकार को पुनर्विचार करना पड़ेगा। इन मिली जुली प्रतिक्रियाओं के बाद एक बात तय है कि मसले पर बेबस प्रेरकों के खाली हाँथ और भविष्य की चिंता दोनों ठहाका लगाते नजर आ रहे हैं।

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